USDA के अनुमान के मुताबिक, भारत का साल 2026 का कॉटन प्रोडक्शन **24.5 मिलियन बेल्स** रहने वाला है, जबकि घरेलू मांग **26.2 मिलियन बेल्स** की है। सप्लाई-डिमांड के इस गैप और **31 अक्टूबर** को खत्म हो रही ड्यूटी-फ्री इम्पोर्ट की समयसीमा से टेक्सटाइल और स्पिनिंग कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
उत्पादन में कमी की बड़ी वजह
United States Department of Agriculture (USDA) की ताजा रिपोर्ट ने मार्केट में चिंता बढ़ा दी है। खराब मानसून और जलाशयों में पानी का स्तर केवल 60% रहने के कारण कृषि पैदावार पर बुरा असर पड़ रहा है। अनुमान है कि पैदावार में 2% की गिरावट आएगी और यह 464 किलो प्रति हेक्टेयर तक सीमित रह सकती है। इसका सीधा असर भारत के मुख्य कपास उत्पादक राज्यों जैसे मध्य और पश्चिमी भारत पर दिखेगा।
टेक्सटाइल इंडस्ट्री के सामने चुनौती
एक तरफ जहां उत्पादन घट रहा है, वहीं ग्लोबल मार्केट से मिल रहे ऑर्डर्स के कारण भारत में मिल कंजम्पशन 26.2 मिलियन बेल्स तक रहने की उम्मीद है। सप्लाई कम और डिमांड ज्यादा होने से कपास की कीमतों में तेजी आना तय है, जो उन टेक्सटाइल मिलों के लिए एक बड़ा सरदर्द साबित हो सकता है जो पहले से ही पतले मार्जिन पर काम कर रही हैं।
सरकार की पॉलिसी और निवेशकों के लिए रिस्क
फिलहाल सरकार ने कपास के आयात पर ड्यूटी-फ्री छूट दे रखी है, लेकिन यह सुविधा 31 अक्टूबर 2026 तक ही है। यदि सरकार ने इसे आगे नहीं बढ़ाया, तो इम्पोर्टेड कॉटन बहुत महंगा हो जाएगा।
निवेशकों के लिए यह स्थिति सतर्क रहने की है। जिन कंपनियों के पास अच्छी इन्वेंट्री है, वे शायद इस उठा-पटक को झेल लें, लेकिन बाकी कंपनियों के लिए अपने मुनाफे को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। आने वाले महीनों में निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि क्या सरकार आयात शुल्क में दी गई राहत को जारी रखती है या नहीं। साथ ही, कॉटन की कीमतों और मानसून की चाल पर नजर रखना भी जरूरी होगा।
