U.S. Treasury द्वारा लंबे समय के बॉन्ड बायबैक को दोगुना करके **$4 बिलियन** प्रति ऑपरेशन करने के फैसले से भारतीय बाजार में सोने-चांदी की कीमतों में उछाल आया है। यह कदम उधार लेने की लागत कम करने के लिए उठाया गया है, जिससे कीमती धातुएं एक सुरक्षित एसेट के रूप में उभर रही हैं।
दुनिया भर के कमोडिटी बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। U.S. Treasury ने अपने लॉन्ग-टर्म गवर्नमेंट बॉन्ड बायबैक प्रोग्राम को दोगुना कर दिया है। 9 सितंबर, 2026 से लागू होने वाले इस फैसले के तहत अब प्रति ऑपरेशन $4 बिलियन के बॉन्ड खरीदे जाएंगे। इस कदम का मुख्य उद्देश्य बॉन्ड मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ाना और उन यील्ड्स (Yields) को कंट्रोल करना है, जो हाल ही में कई सालों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थीं।
भारतीय बाजारों पर असर
इस वैश्विक हलचल का सीधा असर भारत में देखने को मिला है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर अक्टूबर गोल्ड फ्यूचर्स करीब ₹1,63,146 प्रति 10 ग्राम और सितंबर सिल्वर फ्यूचर्स ₹2,45,700 प्रति किलो के आसपास कारोबार कर रहे हैं। वहीं, ग्लोबल स्पॉट गोल्ड की कीमतें $4,650 प्रति औंस के स्तर पर मजबूती के साथ बनी हुई हैं। जब बॉन्ड यील्ड गिरती है, तो सोने और चांदी की मांग बढ़ जाती है क्योंकि निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर रुख करते हैं।
क्यों बढ़ रहा है धातुओं का आकर्षण?
निवेशक इस समय कीमती धातुओं को अमेरिका की फिस्कल हेल्थ के खिलाफ एक 'हेज' (Hedge) के रूप में देख रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि कर्ज का बोझ बढ़ने के कारण करेंसी की वैल्यू कम होने का डर बना हुआ है, जिससे 'डिबेसमेंट ट्रेड' (Debasement Trade) को हवा मिल रही है।
चुनौतियां और मार्केट का नजरिया
हालांकि, बाजार में अभी भी संशय बना हुआ है कि क्या यह $40 ट्रिलियन के अमेरिकी कर्ज का कोई स्थायी समाधान है या सिर्फ यील्ड को दबाने का एक अस्थायी उपाय। यदि फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) मुद्रास्फीति से लड़ने के लिए सख्त ब्याज दर नीति जारी रखता है, तो यह लिक्विडिटी बूस्ट का असर खत्म हो सकता है। निवेशक अब आगामी U.S. PCE महंगाई डेटा पर नजर बनाए हुए हैं, जो यह तय करेगा कि धातुओं की यह तेजी आगे भी जारी रहेगी या बाजार का रुख फिर से डॉलर की ओर मुड़ जाएगा।
