US-Russia Diesel Deal: एनर्जी 'सीजफायर' से दुनिया भर के बाजारों में हलचल, क्या महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?

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AuthorMehul Desai|Published at:
US-Russia Diesel Deal: एनर्जी 'सीजफायर' से दुनिया भर के बाजारों में हलचल, क्या महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?

राष्ट्रपति Donald Trump ने रूस से डीजल आयात करने का बड़ा फैसला लिया है। US Treasury ने इसे अप्रैल 2027 तक मंजूरी दी है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे भारत जैसे देशों के लिए सप्लाई का संकट और कीमतें बढ़ने का जोखिम बढ़ गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने रूस के साथ एक 'एनर्जी सीजफायर' के तहत डीजल आयात करने की घोषणा की है। इस डील के लिए US Treasury Department ने एक स्पेशल लाइसेंस जारी किया है, जो अप्रैल 2027 तक प्रभावी रहेगा। इस समझौते के तहत शुरुआती चरण में 3,00,000 टन डीजल आयात किया जाएगा, जिसे नवंबर में बढ़ाकर 5,00,000 टन करने की योजना है। कुल मिलाकर यह लक्ष्य 48 लाख टन डीजल का है।

भारत और अन्य देशों के लिए सप्लाई का रिस्क

इस डील का मुख्य मकसद अमेरिकी बाजार में ईंधन की बढ़ती कीमतों को काबू करना है। हालांकि, भारत, ब्राजील और तुर्की जैसे देश जो लंबे समय से रूस के सस्ते डीजल पर निर्भर हैं, उनके लिए अब सप्लाई का संकट पैदा हो सकता है। अगर रूस अपनी रिफाइंड फ्यूल सप्लाई को अमेरिका की तरफ मोड़ता है, तो अन्य खरीदारों के लिए बाजार में मारामारी बढ़ सकती है।

रिफाइनिंग क्षमता पर सवाल

मार्केट एक्सपर्ट्स को संदेह है कि क्या रूस वादे के मुताबिक सप्लाई दे पाएगा। रूस की रिफाइनिंग क्षमता पहले से ही बुनियादी ढांचे की दिक्कतों और तकनीकी चुनौतियों से जूझ रही है। यदि रूस उत्पादन बढ़ाने में विफल रहता है, तो इसका सीधा असर ग्लोबल कीमतों पर पड़ेगा और भारत जैसे इम्पोर्टर्स के लिए ईंधन महंगा हो सकता है।

कानूनी और भू-राजनीतिक चुनौतियां

यह डील विवादों में भी है। अमेरिकी सांसदों ने 2022 के कानून का हवाला देते हुए इसे चुनौती दी है, जो रूस से ऊर्जा उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगाता है। साथ ही, डिप्लोमैटिक हलकों में इस बात पर चिंता जताई जा रही है कि यह डील रूसी खजाने को और मजबूत कर सकती है, जिससे जियोपॉलिटिकल तनाव बढ़ सकता है।

मार्केट का मिजाज

इस खबर के बाद ग्लोबल एनर्जी मार्केट्स में काफी हलचल देखी गई है। अक्टूबर 2026 के मध्य तक, Brent Crude और WTI फ्यूचर्स में मामूली गिरावट दर्ज की गई, जो बाजार की अनिश्चितता को दर्शाता है। निवेशक अब इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि क्या अमेरिका वास्तव में उतनी मात्रा में फ्यूल हासिल कर पाएगा या फिर यह फैसला अंत में ग्लोबल फ्यूल प्राइस के लिए खतरा बनेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.