अमेरिका का बड़ा फैसला: तेल 'waivers' समाप्त
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेस्सेंट ने साफ कर दिया है कि रूस और ईरान से तेल की बिक्री के लिए दी जा रही शॉर्ट-टर्म 'waivers' को रिन्यू नहीं किया जाएगा। रूस से जुड़े ऐसे ही एक वेवर की समय सीमा 11 अप्रैल 2026 को खत्म हो गई है, जबकि ईरान के लिए यह 19 अप्रैल 2026 को समाप्त हो जाएगी। यह कदम इन देशों पर वित्तीय दबाव बढ़ाने के इरादे से उठाया गया है।
कच्चे तेल की कीमतों पर असर
इस फैसले से ठीक पहले, क्रूड ऑयल की कीमतों में कुछ नरमी देखी गई थी। 17 अप्रैल 2026 को WTI क्रूड करीब $89.81 प्रति बैरल तक गिर गया था, जबकि 15 अप्रैल 2026 को ब्रेंट फ्यूचर्स $95.58 के आसपास ट्रेड कर रहा था। हालांकि, भू-राजनीतिक तनावों के चलते ग्लोबल क्रूड की कीमतें पिछले साल की तुलना में अभी भी काफी ज्यादा हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि नए प्रतिबंधों के लागू होने से बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रहेगा।
भारत की रणनीति और नए समीकरण
हाल ही में, खत्म हो रहे 'waivers' का फायदा उठाते हुए भारत ने रूस से तेल आयात में काफी बढ़ोतरी की थी। मार्च 2026 में यह लगभग 20 लाख बैरल प्रति दिन (bpd) तक पहुंच गया था, जो उस महीने के कुल आयात का लगभग 44.4% था। फरवरी 2026 में यह आंकड़ा 10 लाख bpd से थोड़ा ऊपर था। इन 'waivers' ने भारतीय रिफाइनरियों को सीधे रूसी कंपनियों से सौदे करने और वॉशिंगटन के साथ तालमेल बिठाने में मदद की थी।
हालांकि, अब समायोजन की उम्मीद है। फिर भी, रूसी क्रूड अपनी कीमत और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से बचते हुए लॉजिस्टिक्स के फायदे के कारण भारत के लिए एक पसंदीदा इंपोर्ट विकल्प बने रहने की संभावना है। वहीं, चीन ने रूस से तेल का आयात लगातार बढ़ाया है, जो फरवरी 2026 में औसतन 2.09 मिलियन bpd था और वह रूस के जीवाश्म ईंधन का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। इस बीच, एक्सॉनमोबिल (मार्केट कैप लगभग $630 बिलियन, P/E 21.35-22.7) और शेल (वैल्यू $250-257 बिलियन, P/E 14.8-15.37) जैसी बड़ी एनर्जी कंपनियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी, लेकिन उनकी वैल्यूएशन पर भी भू-राजनीतिक बदलावों का असर दिखेगा।
भारत और ट्रेडर्स के लिए मुख्य जोखिम
'Waivers' का खत्म होना एनर्जी ट्रेडर्स और रिफाइनरों, खासकर भारत के लिए, एक चुनौतीपूर्ण माहौल तैयार कर रहा है। सबसे बड़ा जोखिम सेकेंडरी सैंक्शन (Secondary Sanctions) का बढ़ता खतरा है। हालांकि रूसी तेल पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं है, लेकिन अमेरिकी ट्रेजरी ने ऐसी वित्तीय संस्थाओं के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की चेतावनी दी है जो गैर-अनुपालन वाले सौदों में मदद करती हैं। यह फोकस बैंकों के लिए डॉलर सिस्टम तक पहुंच को मुश्किल बना सकता है और कंपनियों के लिए सैंक्शन वाले तेल का व्यापार करना कठिन हो सकता है। इससे रिफाइनरों को कच्चे तेल की ऊंची लागत, बैंकिंग और बीमा के सीमित विकल्प और कम प्रॉफिट मार्जिन का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, 'waivers' के अभाव में सप्लाई चेन अधिक अस्थिर और अप्रत्याशित हो सकती है।
आगे का अनुमान
विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय रिफाइनरियां रूसी क्रूड को पूरी तरह छोड़ने के बजाय, अपने परिचालन को समायोजित करेंगी और सीधे सैंक्शन वाली संस्थाओं के साथ सौदेबाजी और 'on the water' कार्गो के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करेंगी। बाजार अब अमेरिकी सरकार के वित्तीय प्रवर्तन (Financial Enforcement) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और बिचौलियों को रोकने की उसकी क्षमता से काफी प्रभावित होगा। कुछ अनुमानों के अनुसार, 2026 की दूसरी तिमाही के अंत तक WTI क्रूड $89 से $97 प्रति बैरल के बीच कारोबार कर सकता है, और साल के अंत तक यह $111-$137 तक भी पहुंच सकता है। हालांकि, यह सब भू-राजनीतिक घटनाओं और प्रतिबंधों की प्रभावशीलता पर निर्भर करेगा। इन बाजार समर्थन उपायों को हटाने का मतलब है कि अधिक वित्तीय दबाव और लंबी अवधि में कीमतों में बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
