क्यों मचा हाहाकार? UBS की चेतावनी का आधार
UBS इन्वेस्टमेंट बैंक के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिस का कहना है कि सिल्वर की कीमतों में आई यह जबरदस्त गिरावट कोई आम बात नहीं है। यह मेटल सेल-ऑफ (sell-off) से पहले ही काफी 'ओवरस्ट्रेच्ड' (overstretched) पोजीशन में था, यानी अपनी असली कीमत से काफी ऊपर जा चुका था।
वोलेटिलिटी ने तोड़े सारे रिकॉर्ड
UBS ने खुलासा किया है कि सिल्वर की कीमतों में एक दिन का उतार-चढ़ाव (historical volatility) लगभग 55% से बढ़कर 115% (एक महीने के लिए) और 78% (तीन महीने के लिए) तक पहुंच गया है। यह स्तर करीब 50 सालों में सबसे ज्यादा है। इस भारी वोलेटिलिटी का मतलब है कि मार्केट में जबरदस्त दबाव है।
डिमांड में नरमी और चिंताजनक संकेत
इसके अलावा, सिल्वर की डिमांड के अहम संकेत भी कमजोर पड़ रहे थे। ETF में खरीदारी घट रही थी और स्पेकुलेटिव फ्यूचर्स (speculative futures) पोजीशन भी कम हो रही थीं। चीन जैसे बाजारों में कीमतों में असामान्य प्रीमियम (premiums) भी मांग के असमान वितरण की ओर इशारा कर रहे थे, जिससे कीमतों में और भी ज्यादा उतार-चढ़ाव का खतरा बढ़ गया था।
मार्जिन प्रेशर और जोखिम-इनाम का असंतुलन
बढ़ती वोलेटिलिटी के चलते CME Group जैसे एक्सचेंजों को सिल्वर फ्यूचर्स के लिए मार्जिन रिक्वायरमेंट्स (margin requirements) बढ़ानी पड़ीं। इससे होल्डिंग की लागत बढ़ी और जबरन बिकवाली (forced selling) का जोखिम भी बढ़ गया। UBS का मानना है कि 60-120% वोलेटिलिटी वाले एसेट में लॉन्ग पोजीशन लेने के लिए 30-60% रिटर्न की उम्मीद होनी चाहिए, जो फिलहाल सिल्वर में नहीं दिख रही।
इंडस्ट्रियल डिमांड और आगे का अनुमान
सिल्वर की 50% से ज्यादा मांग इंडस्ट्रियल यूज (industrial use) से आती है। ऐसे में, अगर कीमतें बहुत ऊंची रहती हैं, तो कंजम्पशन (consumption) घट सकता है और लोग इसके विकल्प तलाश सकते हैं। UBS ने लॉन्ग-टर्म के लिए सिल्वर का अनुमान $85 प्रति औंस पर बरकरार रखा है, लेकिन उनका कहना है कि मौजूदा अत्यधिक वोलेटिलिटी को देखते हुए शॉर्ट-टर्म अनुमानों पर सावधानी बरतनी होगी। कीमतों में और एडजस्टमेंट की जरूरत पड़ सकती है ताकि वे मौजूदा जोखिमों के अनुरूप आ सकें।