ईरान युद्ध के चलते वैश्विक एनर्जी मार्केट में मची उथल-पुथल के बीच, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने OPEC+ समूह से बाहर निकलने का बड़ा ऐलान किया है। यह निर्णय UAE के लिए बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत देता है, जो देश के राष्ट्रीय हितों और प्रोडक्शन पर स्वायत्तता को प्राथमिकता देने की ओर इशारा करता है।
UAE का यह कदम 1 मई से लागू होगा। कंपनी का कहना है कि यह फैसला ईरान युद्ध से उत्पन्न एनर्जी संकट के बीच प्रोडक्शन पर ज्यादा कंट्रोल पाने के लिए लिया गया है। UAE अपनी उत्पादन क्षमता को 2027 तक बढ़ाकर 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन करने की योजना बना रहा है, जो उसके मौजूदा कोटे से काफी ज्यादा है। यह उसकी अपनी उत्पादन योजनाओं को सामूहिक निर्णयों से बंधे बिना आगे बढ़ाने की सुविधा देगा।
ईरान युद्ध ने महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों को बाधित कर दिया है, जिससे वैश्विक सप्लाई में भारी कमी आई है। हॉरमुज़ जलडमरूमध्य, जिससे दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल और एलएनजी (LNG) सप्लाई होता है, के माध्यम से समुद्री यातायात लगभग शून्य हो गया है। इस संकट ने रिकॉर्ड तोड़ सप्लाई की बाधाएं खड़ी की हैं, जिससे ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतें $100 के पार चली गई थीं और $126 तक जा पहुंची थीं। UAE का बाहर निकलना OPEC+ के पहले से दिख रहे एकजुट फ्रंट को कमजोर करता है, जो सऊदी अरब के नेतृत्व को चुनौती दे सकता है।
यह अलगाव OPEC+ के भीतर और अधिक बिखराव ला सकता है, जिससे व्यक्तिगत उत्पादकों को राष्ट्रीय हितों के आधार पर उत्पादन तय करने की स्वतंत्रता मिलेगी। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी OPEC पर कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाने और वैश्विक बाजारों का शोषण करने का आरोप लगाया था। UAE की यह निराशा भी है कि ईरान हमलों के प्रति खाड़ी देशों और अरब लीग की प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं थी।
UAE के इस कदम से पहले से ही अस्थिर ऊर्जा बाजार में जोखिम बढ़ गया है। प्रमुख उत्पादक के बाहर निकलने से OPEC की वैश्विक सप्लाई को प्रबंधित करने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे कीमतों में उतार-चढ़ाव की संभावना बढ़ सकती है। इसके अलावा, UAE स्वयं अपने निर्यात के लिए हॉरमुज़ जलडमरूमध्य पर बहुत अधिक निर्भर है; वहां किसी भी निरंतर व्यवधान से उसके राजस्व प्रवाह और आर्थिक स्थिरता को सीधा खतरा बना रहेगा।
विश्लेषकों का मानना है कि OPEC+ के लिए यह एक झटका है, लेकिन इससे UAE को अधिक उत्पादन लचीलापन मिलेगा और क्षमता विस्तार के साथ वैश्विक सप्लाई बढ़ सकती है। यह वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की व्यापक प्रवृत्ति का संकेत देता है। हालांकि, ईरान युद्ध के कारण तत्काल बाजार प्रभाव फिलहाल सीमित है, लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव एक अधिक खंडित और गतिशील तेल बाजार की ओर इशारा करते हैं।
