क्यों रॉकेट बने मेटल?
इस बम्पर तेजी की मुख्य वजह है आसान हुए ट्रेड टैरिफ (Tariff) और टेक्नोलॉजी से जुड़े सेक्टर्स की तरफ से बढ़ती मांग। निर्मल बंग सिक्योरिटीज के एनालिस्ट (Analyst) कुणाल शाह बताते हैं कि टैरिफ कम होने से चीन और ब्राजील जैसी बड़ी इकोनॉमी में डिमांड बढ़ी है, जिससे मेटल मार्केट में रीस्टॉकिंग (Restocking) का दौर चल रहा है।
कॉपर और एल्युमिनियम का रिकॉर्ड प्रदर्शन
एनालिस्ट कुणाल शाह के अनुसार, कॉपर फिलहाल $13,000 प्रति टन के आसपास है और आने वाले समय में यह $16,500–$17,000 प्रति टन तक जा सकता है। इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV), रिन्यूएबल एनर्जी और AI के चलते डेटा सेंटर की बढ़ती मांग इसकी वजह है। वहीं, एल्युमिनियम $3,100–$3,125 प्रति टन पर ट्रेड कर रहा है और $3,400–$3,500 तक जा सकता है। जिंक भी $3,300–$3,400 प्रति टन पर मजबूत बना हुआ है।
2026 में बेस मेटल्स का दबदबा
एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2026 में बेस मेटल्स, प्रेशियस मेटल्स (Precious Metals) से बेहतर प्रदर्शन करेंगे। सप्लाई डेफिसिट (Supply Deficit), इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट और टैरिफ कम होने का फायदा इन मेटल्स को मिलेगा। चीन की इंडस्ट्रियल पॉलिसी (Industrial Policy) इसमें अहम भूमिका निभाएगी।
सिल्वर की राह थोड़ी मुश्किल?
सिल्वर की कीमत $88–$91 प्रति औंस के आसपास है। इसकी तेजी काफी हद तक इंडस्ट्रियल एप्लीकेशन्स (Industrial Applications) पर टिकी है, जो इसकी कुल डिमांड का आधे से ज्यादा है। गोल्ड की तरह इसे सेंट्रल बैंक का सपोर्ट नहीं मिलता। $95 से $100 प्रति औंस के लेवल पर इसे बड़ी रेजिस्टेंस (Resistance) मिल रही है। इसके अलावा, प्रोडक्शन में 'थ्रिफ्टिंग' (Thrifting) यानी कम सिल्वर इस्तेमाल होने से भी मांग पर असर पड़ सकता है।
बड़े रिस्क फैक्टर
ट्रेड पॉलिसी में अनिश्चितता, चीन की इकोनॉमिक ग्रोथ और किसी भी तरह का ग्लोबल इकोनॉमिक स्लोडाउन (Economic Slowdown) मेटल मार्केट के लिए बड़ा रिस्क पैदा कर सकता है। अगर ग्लोबल ग्रोथ धीमी पड़ी तो इंडस्ट्रियल मेटल्स की मांग अचानक गिर सकती है, जिससे कीमतों पर भारी दबाव आ सकता है।