2026-27 के सीजन में भारत का शुगर प्रोडक्शन **15%** तक गिर सकता है। सूखे की वजह से उत्पादन **27 मिलियन टन** रहने का अनुमान है, जबकि मांग **29 मिलियन टन** के करीब है। सप्लाई में इस कमी का सीधा असर रिटेल कीमतों पर दिख रहा है।
भारत का शुगर सेक्टर इस समय एक कठिन दौर से गुजर रहा है। साल 2026-27 के लिए अनुमानित उत्पादन सिर्फ 27 मिलियन टन रहने की उम्मीद है। पिछले सालों के मुकाबले यह 15% की बड़ी गिरावट है, जिससे सप्लाई और डिमांड के बीच एक बड़ा गैप पैदा हो गया है। देश की घरेलू खपत 28.5 से 29 मिलियन टन रहने का अनुमान है। महाराष्ट्र और उत्तरी कर्नाटक जैसे प्रमुख शुगर उत्पादक राज्यों में पड़े भीषण सूखे ने फसल की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है।
खेती का बदलता स्वरूप और कच्चा माल
मौसम की मार के अलावा, किसान अब गन्ने की जगह दूसरी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में पानी की कमी के चलते किसान मक्का (Maize) और सोयाबीन जैसी फसलों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं, जिन्हें गन्ने के मुकाबले कम पानी की जरूरत होती है। वहीं, चीनी मिलों के लिए एक और बड़ी चुनौती स्थानीय गुड़ (Jaggery) निर्माता हैं। ये छोटे प्लेयर गन्ने के लिए मिलों से ज्यादा कीमत चुका रहे हैं, जिससे संगठित शुगर मिलों के लिए कच्चे माल की कमी हो गई है और उनके मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
रिटेल मार्केट में चीनी की कीमत ₹58.87 प्रति किलो के आसपास पहुंच चुकी है। हालांकि बढ़ती कीमतें आकर्षक लग सकती हैं, लेकिन उत्पादन में गिरावट मिलों की क्षमता (Capacity Utilization) को प्रभावित करेगी, जिससे मुनाफा कम हो सकता है। अब बाजार की नजरें सरकारी फैसलों पर हैं। खाद्य महंगाई को काबू में रखने के लिए सरकार कच्चे और सफेद चीनी के आयात (Import) पर नियमों को आसान कर सकती है। निवेशकों को सरकार के इम्पोर्ट ड्यूटी से जुड़े फैसलों और आने वाले महीनों में क्रशिंग गतिविधियों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए।
