मिलों पर क्यों बढ़ रहा मार्जिन का दबाव?
केंद्र सरकार ने अगले फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए गन्ने की फेयर एंड रेमुनरेटिव प्राइस (FRP) को 3% बढ़ाकर ₹365 प्रति क्विंटल कर दिया है। हालांकि, चीनी का मिनिमम सेलिंग प्राइस (MSP) साल 2018 से ₹31 प्रति किलो पर ही अटका हुआ है। इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) अब मांग कर रही है कि चीनी का MSP बढ़ाकर ₹36 से ₹37 प्रति किलो किया जाए। बढ़ती उत्पादन लागत और एक ही जगह अटकी हुई कमाई के कारण मिलों के कैश फ्लो पर भारी दबाव आ गया है, और किसानों का बकाया भुगतान तेजी से बढ़ रहा है।
शेयर बाजार में दिखी चिंता
इस स्थिति का असर शेयर बाजार पर भी दिखा। 7 मई, 2024 को कई बड़ी शुगर कंपनियों के शेयरों में हल्की नरमी देखी गई। Balrampur Chini Mills Ltd. के शेयर 0.04% गिरकर करीब ₹524.80 पर थे, वहीं Triveni Engineering & Industries Ltd. के शेयर 0.37% की गिरावट के साथ ₹405.50 के आसपास कारोबार कर रहे थे। Shree Renuka Sugars Ltd. में 0.34% की गिरावट आई और शेयर ₹29.05 पर थे। Mawana Sugars Ltd. के शेयर भी ₹118.50 के स्तर पर कारोबार कर रहे थे। यह संकेत देता है कि निवेशक इस सेक्टर की कमाई क्षमता को लेकर चिंतित हैं।
उत्पादन बढ़ा, पर मुनाफा क्यों घटा?
आंकड़े बताते हैं कि 2025-26 फाइनेंशियल ईयर के अंत तक अप्रैल तक चीनी उत्पादन पिछले साल के मुकाबले 7% बढ़कर 27.52 मिलियन टन तक पहुंच गया है। लेकिन, सिर्फ उत्पादन बढ़ने से सभी कंपनियों के मुनाफे में इजाफा नहीं हुआ है। Balrampur Chini Mills (मार्केट कैप ~₹17,500 करोड़, TTM P/E 22x) और Triveni Engineering & Industries (मार्केट कैप ~₹9,200 करोड़, P/E 20x) जैसी कंपनियां इथेनॉल उत्पादन जैसे अन्य कामों से भी कमाई कर रही हैं, जिससे उन्हें कुछ राहत मिली है। वहीं, Shree Renuka Sugars (मार्केट कैप ~₹4,800 करोड़, P/E 18x) और Mawana Sugars (मार्केट कैप ~₹1,300 करोड़, P/E 15x) जैसी कंपनियां सीधे तौर पर चीनी की कीमतों पर निर्भर हैं। स्थिर MSP और बढ़ती लागत की मार इन पर ज्यादा पड़ रही है।
पिछले अनुभव और सरकारी नीतियां
इतिहास बताता है कि FRP में बड़ी बढ़ोतरी के बाद अक्सर शुगर कंपनियों के शेयरों में गिरावट आई है, जैसा कि 2017-18 और 2020-21 में हुआ था। इथेनॉल उत्पादन की ओर झुकाव सरकार की प्राथमिकता है और यह मिलों को नकदी संकट से उबारने में मदद कर रहा है। हालांकि, इथेनॉल की खरीद दरें और ब्लेंडिंग को लेकर सरकारी नीतियां भी जोखिम पैदा करती हैं। महाराष्ट्र में किसानों का बकाया गन्ना भुगतान mid-April तक बढ़कर ₹2,130 करोड़ हो गया है, जो पिछले साल इसी अवधि में ₹752 करोड़ था। यह दिखाता है कि मिलों को नकदी का कितना बड़ा सिस्टमैटिक इशू झेलना पड़ रहा है।
वित्तीय चुनौतियां और विश्लेषकों का नज़रिया
शुगर इंडस्ट्री की माली हालत काफी हद तक सरकारी नीतियों पर टिकी है। किसानों को दिए जाने वाले भुगतान और चीनी की बिक्री मूल्य के बीच का अंतर मिलों को लगातार कमजोर बना रहा है। अगर सरकार FRP में बढ़ोतरी के अनुपात में Sugar MSP या इथेनॉल खरीद दरें नहीं बढ़ाती है, तो किसानों का बकाया और बढ़ सकता है। जो कंपनियां सिर्फ चीनी बेचने पर निर्भर हैं, वे इथेनॉल या बिजली जैसे अन्य जरियों से कमाई करने वाली कंपनियों से ज्यादा जोखिम में हैं। कुछ राज्यों द्वारा घोषित स्टेट एडवाइज्ड प्राइस (SAP) भी केंद्रीय FRP से ज्यादा होने पर लागत बढ़ा देते हैं। ब्रोकरेज फर्म्स इस सेक्टर को लेकर सतर्क हैं और ज्यादातर 'होल्ड' या 'न्यूट्रल' रेटिंग दे रही हैं। वे इथेनॉल पर फोकस को सकारात्मक मानते हैं, लेकिन चीनी कारोबार की मार्जिन स्थिरता पर चिंता जता रहे हैं। उत्पादन लागत बढ़ने के साथ MSP और इथेनॉल कीमतों में समय पर और पर्याप्त बढ़ोतरी की दरकार है, जो अभी भी अनिश्चित है।
