त्योहारी सीजन में सुस्त मांग और सरकार द्वारा लागू किए गए सख्त फोर्टनाइटली सेल्स कोटे के कारण भारतीय शुगर मिल्स और ट्रेडर्स संकट में हैं। इन नियमों ने कीमतों में **20%** तक की गिरावट ला दी है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन पर भारी दबाव है।
भारतीय शुगर इंडस्ट्री में फिलहाल एक अजीब गतिरोध की स्थिति बनी हुई है। फेस्टिव सीजन की उम्मीदों पर पानी फिरने के बाद ट्रेडर्स के पास भारी स्टॉक जमा है, जबकि होलसेल प्राइसेज लगातार नीचे गिर रही हैं। यह स्थिति मिल मालिकों के लिए मुनाफे को बनाए रखने की बड़ी चुनौती लेकर आई है।
सरकारी नियमों का असर
रिटेल महंगाई को कंट्रोल करने के लिए सरकार ने सितंबर 2026 से मासिक कोटे के बजाय 'फोर्टनाइटली' (पाक्षिक) सेल्स सिस्टम लागू कर दिया है। सितंबर के पहले पखवाड़े के लिए 1.3 मिलियन मीट्रिक टन का कोटा तय किया गया था। नए नियमों के मुताबिक, मिलों को बिलिंग के 7 दिनों के भीतर स्टॉक डिस्पैच करना अनिवार्य है। इस सख्त डेडलाइन और सुस्त मांग के चलते मिलों को अब या तो कम कीमतों पर माल बेचना पड़ रहा है या फिर पेनल्टी का डर झेलना पड़ रहा है।
बाजार में कीमतों की गिरावट
बाजार का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है। एक्स-मिल शुगर प्राइसेज अपने हालिया पीक से करीब 20% नीचे आ चुकी हैं। जिन ट्रेडर्स ने फेस्टिव सीजन के नाम पर भारी स्टॉक जमा किया था, वे अब नुकसान कम करने के लिए माल निकालने की होड़ में हैं, जिससे कीमतों में और गिरावट आ रही है।
बढ़ते रिस्क और चुनौतियां
सरकार ने रेगुलेशन को और सख्त कर दिया है। 15 सितंबर 2026 से चीनी डीलरों के लिए स्टॉक लिमिट को 4,000 क्विंटल से घटाकर 2,000 क्विंटल कर दिया गया है, जो 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगी। साथ ही, 2026-27 का शुगर क्रशिंग सीजन भी सामान्य से 10-15 दिन पहले शुरू करने की तैयारी है, ताकि बाजार में सप्लाई बनी रहे। इन सब के बीच, 30 सितंबर 2026 तक एक्सपोर्ट पर बैन जारी रहने से घरेलू सप्लाई का दबाव बना रहेगा, जिसका सीधा असर कंपनियों के कैश फ्लो और मार्जिन्स पर पड़ सकता है।
