Strait of Hormuz में संकट: टैंकर हमलों से बिगाड़ा तेल का गणित, फ्रेट रेट $1 मिलियन के पार

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Strait of Hormuz में संकट: टैंकर हमलों से बिगाड़ा तेल का गणित, फ्रेट रेट $1 मिलियन के पार

Strait of Hormuz में समुद्री हमलों की घटनाओं में भारी इजाफा हुआ है। अब तक **30** बड़े क्रूड ऑयल टैंकर क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, जिसके कारण डेली फ्रेट रेट **$1 मिलियन** के स्तर को पार कर गया है। भारत अपनी जरूरत का **85%** से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में इस तनाव का असर भारतीय कंपनियों के मार्जिन और महंगाई पर पड़ना तय है।

समुद्री सुरक्षा में बड़ी चुनौती

दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल व्यापार मार्ग यानी Strait of Hormuz में सुरक्षा हालात बेकाबू होते दिख रहे हैं। सिर्फ अक्टूबर महीने में ही हमलों की 28 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिससे फरवरी 2026 से अब तक कुल 113 सुरक्षा घटनाएं हो चुकी हैं। इन हमलों ने ग्लोबल सुपरटैंकर फ्लीट के लगभग 3.5% हिस्से यानी 30 बड़े क्रूड ऑयल टैंकरों (VLCCs) को प्रभावित किया है, जिससे ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन पूरी तरह डगमगा गई है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर असर

इस तनाव का सीधा असर शिपिंग कॉस्ट पर पड़ा है। ऑपरेटरों को बढ़ते इंश्योरेंस प्रीमियम और सुरक्षा जोखिमों के कारण अपना किराया बढ़ाना पड़ा है, जिससे फ्रेट रेट $1 मिलियन के ऊपर निकल गए हैं। चूंकि भारत का अधिकांश कच्चा तेल इसी खाड़ी क्षेत्र से होकर आता है, इसलिए यह देश के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती बन गया है।

कंपनियों के मार्जिन पर दबाव

शिपिंग खर्च में इस उछाल का असर 'लैंडेड कॉस्ट ऑफ क्रूड' पर पड़ रहा है। भारतीय रिफाइनरी कंपनियों जैसे Indian Oil Corporation, BPCL और HPCL के लिए अपने रिफाइनिंग और मार्केटिंग मार्जिन को बचाए रखना मुश्किल हो रहा है। यदि ये कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत को पेट्रोल-डीजल के रिटेल भावों के जरिए ग्राहकों पर नहीं डालती हैं, तो उनके नेट प्रॉफिट में गिरावट तय है।

वहीं, ONGC और Oil India जैसी अपस्ट्रीम कंपनियां भी ग्लोबल बेंचमार्क जैसे Brent की अस्थिरता से प्रभावित हो रही हैं। इसके अलावा Reliance Industries और Nayara Energy जैसी बड़ी निजी रिफाइनरियों को भी अपनी रिफाइनरी थ्रूपुट को बनाए रखने के लिए इस रिस्क मैनेजमेंट से जूझना पड़ रहा है।

महंगाई का खतरा

भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा महंगाई है। यदि सप्लाई चेन में यह बाधा बनी रहती है, तो रुपये पर दबाव बढ़ेगा और आम जनता के लिए जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। अब निवेशकों की नजरें आने वाले क्वार्टरली नतीजों पर होंगी कि ये कंपनियां अपनी ऑपरेटिंग कॉस्ट और इन्वेंट्री मैनेजमेंट को कैसे संभालती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.