चांदी ने सोने को कैसे पछाड़ा?
पिछले साल अप्रैल 2025 (अक्षय तृतीया) के बाद से कीमती धातुओं के बाज़ार में एक बड़ा अंतर देखने को मिला है, जिसमें चांदी (Silver) सबसे मज़बूत साबित हुई है। जहाँ सोने (Gold) ने इस अवधि में लगभग 58.7% का अच्छा खासा उछाल दिखाया है, जो ₹97,910 प्रति 10 ग्राम से बढ़कर लगभग ₹1.55 लाख तक पहुँचा है, वहीं चांदी ने करीब 170% की ज़बरदस्त छलांग लगाई है। चांदी की कीमत ₹1 लाख प्रति किलोग्राम से बढ़कर लगभग ₹2.70 लाख प्रति किलोग्राम तक पहुँच गई है।
क्यों चली चांदी की 'रॉकेट' जैसी चाल?
16 अप्रैल 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, 24-कैरेट सोने का भाव लगभग ₹15,536 प्रति ग्राम है, जबकि चांदी ₹270 प्रति ग्राम (₹2,70,000 प्रति किलोग्राम) पर ट्रेड कर रही है। इस प्रदर्शन का अंतर बाज़ार के रुझानों से भी स्पष्ट होता है। MCX पर चांदी के मई 2026 वायदा (Futures) ₹2,55,735 प्रति किलोग्राम तक पहुँच गए, जबकि सोने के जून 2026 वायदा ₹1,54,756 प्रति 10 ग्राम पर मामूली बढ़त के साथ देखे गए। ETF डेटा भी यही बताता है: iShares Silver Trust (SLI) ने पिछले 1 साल में +144.27% का रिटर्न दिया है, जो SPDR Gold Shares (GLD) के +49.52% से काफी बेहतर है। मार्च 2026 में दोनों धातुओं में गिरावट आई थी, लेकिन चांदी की रिकवरी ने इसके अलग बाज़ार चालकों को दिखाया है।
इंडस्ट्रियल डिमांड ही है असली वजह
चांदी की मज़बूत परफॉरमेंस का सबसे बड़ा कारण इसका दोहरा स्वभाव है - यह एक कीमती धातु होने के साथ-साथ एक ज़रूरी इंडस्ट्रियल मटेरियल भी है। सोलर एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। 2024 में वैश्विक चांदी की मांग का 60% से अधिक हिस्सा, यानी रिकॉर्ड 680.5 मिलियन औंस, इन्हीं औद्योगिक उपयोगों से आया है। ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) और नई टेक्नोलॉजीज के कारण चांदी की यह मांग मज़बूत बनी हुई है, जिससे बाज़ार में लगातार सप्लाई की कमी (Deficit) देखी जा रही है। पिछले पाँच सालों से लगातार सप्लाई की कमी बनी हुई है, जो 2023-2024 में 176-200 मिलियन औंस तक रही। यह तंग फिजिकल सप्लाई चांदी की कीमतों को सहारा दे रही है। इसके विपरीत, सोने की कीमत मुख्य रूप से आर्थिक बदलावों, ब्याज दरों, डॉलर की मज़बूती और वैश्विक स्थिरता से ज़्यादा प्रभावित होती है।
जोखिम और भविष्य का नज़रिया
चांदी में आई तेज़ उछाल के बावजूद, इसकी इंडस्ट्रियल मांग पर निर्भरता इसे ज़्यादा वोलेटाइल (Volatile) बनाती है। वहीं, सोने में भू-राजनीतिक तनाव कम होने या ब्याज दरें बढ़ने जैसे कारक इसकी मज़बूती को रोक सकते हैं। फंड हाउस जैसे Tata Asset Management भी मौजूदा बाज़ार की अनिश्चितता को देखते हुए धीरे-धीरे निवेश (Staggered Investment) की सलाह दे रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि सोने और चांदी के चालकों में अंतर बना रह सकता है। सोना शायद एक कंसोलिडेशन (Consolidation) फेज में रह सकता है, जो वैश्विक मौद्रिक नीति और भू-राजनीतिक घटनाओं से तय होगा। Societe Generale और Deutsche Bank जैसी संस्थाओं ने सोने के लिए $6000 प्रति औंस तक के लक्ष्य का अनुमान लगाया है। वहीं, चांदी में इंडस्ट्रियल साइकिल और सप्लाई की कमी के कारण तेज़ उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। चांदी के औसतन $65 प्रति औंस और संभावित रूप से $160 तक जाने के अनुमान हैं। ग्रीन एनर्जी क्रांति और टेक्नोलॉजी की वजह से चांदी की मांग में वृद्धि इसके आउटपरफॉरमेंस को जारी रख सकती है, हालांकि इसमें वोलेटिलिटी ज़्यादा रहेगी।