सिल्वर यानी चांदी की कीमतों में फिलहाल दबाव बना हुआ है। ग्लोबल ईटीएफ (ETF) से लगातार पैसा निकलने और चीन में स्टॉक बढ़ने की वजह से हालिया उछाल फीका पड़ गया है। निवेशक अमेरिकी इकोनॉमी के मिले-जुले संकेतों और भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच उलझे हुए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में चांदी का भाव **$54** से **$61** प्रति औंस के दायरे में ही बना रह सकता है।
क्यों है चांदी पर दबाव?
पिछले तीन दिनों में चांदी की कीमतों में थोड़ी रिकवरी देखने को मिली थी, जिसका मुख्य कारण डॉलर का कमजोर होना और केंद्रीय बैंकों के ऐसे फैसले थे जिनसे यह संकेत मिला कि ब्याज दरें शायद अब और नहीं बढ़ेंगी। हालांकि, इस छोटी सी तेजी के बावजूद, चांदी का भविष्य फिलहाल मिला-जुला नजर आ रहा है। विश्लेषक अभी भी उम्मीद कर रहे हैं कि चांदी का भाव $54 से $61 प्रति औंस के दायरे में ही रहेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि सप्लाई और डिमांड को लेकर गहरी चिंताएं बनी हुई हैं।
निवेशकों के रुझान और स्टॉक का असर
चांदी पर दबाव की एक बड़ी वजह बड़े निवेशकों का रवैया है। आंकड़ों के मुताबिक, 2026 की शुरुआत से अब तक ग्लोबल सिल्वर ईटीएफ (ETFs) से कुल 7.5 करोड़ औंस चांदी निकली है। फरवरी के अंत से बिकवाली का यह ट्रेंड लगातार जारी है, जो दिखाता है कि फाइनेंशियल इन्वेस्टर्स चांदी में पैसा लगाने से कतरा रहे हैं। वहीं, चीन के वेयरहाउसों में स्टॉक अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, जो सितंबर 2025 के बाद सबसे ज्यादा है। जब चीन जैसे बड़े बाजारों में स्टॉक बढ़ता है, तो अक्सर कीमतों पर लगाम लग जाती है, क्योंकि मार्केट को लगता है कि फिजिकल सप्लाई की कोई कमी नहीं है।
अमेरिकी इकोनॉमी और ब्याज दरें
कमोडिटी मार्केट अमेरिकी इकोनॉमी के सुस्त पड़ने पर भी प्रतिक्रिया दे रहा है। 2026 की दूसरी तिमाही में अमेरिका की GDP ग्रोथ घटकर 1.5% रह गई, जो उम्मीदों से काफी कम है। हालांकि, पर्सनल कंजम्पशन अभी भी मजबूत है, लेकिन इन्वेंट्री में कमी और बढ़ते ट्रेड डेफिसिट ने मंदी के संकेत दिए हैं। इसी बीच, अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को 3.5%–3.75% पर स्थिर रखा है। शुरुआती तौर पर इससे कीमती धातुओं को सहारा मिला, लेकिन फेड अभी भी महंगाई पर काबू पाने को प्राथमिकता दे रहा है, जिससे ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। डॉलर की मजबूती पर नजर रखना भी निवेशकों के लिए जरूरी है, क्योंकि कमजोर डॉलर आम तौर पर चांदी जैसी कमोडिटीज को दूसरे देशों के खरीदारों के लिए सस्ता बनाता है, लेकिन फिलहाल यह असर कमजोर फिजिकल फंडामेंटल से दब रहा है।
भू-राजनीतिक जोखिम और मार्केट की चाल
कमोडिटी मार्केट मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव पर भी नजर रखे हुए है, जिसमें स्वेज नहर के पास रुकावटें और तेल उत्पादक क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियां शामिल हैं। ऐसे में जब निवेशक सुरक्षित ठिकानों की ओर भागते हैं, तो चांदी पर इसका असर मिला-जुला रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता के संकेत मिल रहे हैं, जिससे लगता है कि मार्केट सप्लाई चेन के जोखिमों को काफी हद तक अपने अंदर समेट चुका है। निवेशकों को अमेरिका, चीन और यूरोप के इकोनॉमिक इंडिकेटर्स पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही तय करेंगे कि चांदी अपने मौजूदा $54 से $61 के दायरे से बाहर निकल पाएगी या फिर ग्लोबल स्टॉक जमावड़े और औद्योगिक मांग में कमी के कारण और दबाव में आएगी।
