Silver की कीमतों में बड़ी हलचल मची है। जनवरी **2026** के रिकॉर्ड स्तर से चांदी **53%** गिरकर **$54** प्रति औंस पर आ गई है, वहीं भारतीय बाजार (MCX) में भाव **₹1.94 लाख** प्रति किलोग्राम तक फिसल गए हैं।
बाजार में क्यों आई इतनी बड़ी गिरावट?
चांदी में जारी इस गिरावट के पीछे ग्लोबल मार्केट का खराब सेंटीमेंट मुख्य वजह है। जनवरी में $117 प्रति औंस का ऑल-टाइम हाई छूने के बाद, अब कीमतें $54 के आसपास स्थिर होने की कोशिश कर रही हैं। घरेलू बाजार की बात करें, तो MCX पर चांदी ₹3.8 लाख प्रति किलोग्राम के स्तर से लुढ़क कर ₹1.94 लाख के निचले स्तर तक पहुंची है। यह गिरावट बताती है कि अन्य कीमती धातुओं के मुकाबले चांदी आर्थिक चक्रों के प्रति कितनी संवेदनशील है।
ग्लोबल संकेत और दबाव
कीमतों में इस भारी गिरावट के पीछे कई मैक्रोइकॉनॉमिक कारण हैं। लगातार बढ़ती महंगाई, हाई एनर्जी कॉस्ट और US Federal Reserve की ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता ने निवेशकों को प्रॉफिट बुकिंग के लिए मजबूर किया है। चूंकि चांदी का उपयोग इंडस्ट्रियल और प्रेशियस मेटल दोनों तरह से होता है, इसलिए ग्लोबल फैक्ट्री आउटपुट में किसी भी तरह की सुस्ती सीधे इसके भाव पर असर डालती है।
इंडस्ट्रियल डिमांड का क्या होगा?
चांदी की लंबी अवधि की कहानी मुख्य रूप से इसके इंडस्ट्रियल इस्तेमाल पर टिकी है। सोलर एनर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिफिकेशन प्रोजेक्ट्स में इसकी भारी खपत होती है। हालांकि, मार्केट में चिंता यह भी है कि अगर कंपनियां विकल्प तलाश लेती हैं या ग्लोबल इकोनॉमी और ठंडी होती है, तो रिकवरी की रफ्तार धीमी रह सकती है।
निवेशकों के लिए सलाह
भारतीय निवेशकों को एक अतिरिक्त रिस्क का सामना करना पड़ता है—रुपये की चाल। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी डॉलर में तय होती है, इसलिए रुपये में उतार-चढ़ाव सीधे आपके निवेश को प्रभावित करता है। फिलहाल एक्सपर्ट्स का मानना है कि 'बॉटम फिशिंग' (सबसे निचले स्तर पर खरीदारी) के चक्कर में पड़ना रिस्की हो सकता है। आने वाले महीनों में US PCE इन्फ्लेशन डेटा और सेंट्रल बैंक की नीतियों पर नजर रखना जरूरी है, जो तय करेंगे कि चांदी की राह अब आगे कैसी होगी।
