भारत में चांदी का इम्पोर्ट (Import) जून में बुरी तरह गिर गया है। इसकी वजह है सरकार का नया लाइसेंसिंग सिस्टम, जिसने शिपमेंट में देरी कर दी है। सप्लाई में आई इस कमी के चलते, शादी-त्योहारों की डिमांड वाले सीजन से ठीक पहले, लोकल दाम ग्लोबल बेंचमार्क से काफी ऊपर पहुंच गए हैं।
Detailed Coverage
भारत में चांदी की सप्लाई पर बड़ा झटका
भारत का चांदी बाजार इस समय भारी सप्लाई की समस्या से जूझ रहा है। ऐसा नए इम्पोर्ट लाइसेंसिंग नियमों के लागू होने के बाद हुआ है। मई से, सरकार ने चांदी की इम्पोर्ट शिपमेंट के लिए खास परमिट अनिवार्य कर दिया है। यह कदम फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व को बेहतर ढंग से मैनेज करने के लिए उठाया गया है। इस रेगुलेटरी बदलाव की वजह से बड़े बैंक और इम्पोर्टर्स फंसे हुए हैं, जो सरकारी कमेटी से मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। यह कमेटी महीने में कुछ ही बार मिलती है।
इम्पोर्ट वॉल्यूम और मार्केट प्रीमियम पर असर
इन नए नियमों का असर तुरंत दिखना शुरू हो गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जून में चांदी का इम्पोर्ट घटकर लगभग 29 टन रह गया, जो कि जनवरी में 747 टन था। भारत अपनी घरेलू खपत का लगभग पूरा हिस्सा इम्पोर्ट से ही पूरा करता है, इसलिए सप्लाई में अचानक आई कमी से फिजिकल मार्केट में कमी महसूस की जा रही है। नतीजा यह है कि भारतीय खरीदारों को इंटरनेशनल चांदी की कीमतों से ₹10,000 प्रति किलोग्राम से ज्यादा का प्रीमियम देना पड़ रहा है, जो पिछले कई सालों में सबसे ज्यादा है।
ट्रेडर्स और ज्वैलर्स के लिए मुश्किलें
परमिट में देरी के अलावा, ट्रेडर्स को ओरिजिन सर्टिफिकेट (Certificate of Origin) जैसे नए डॉक्यूमेंट्स भी तैयार करने पड़ रहे हैं। इन डॉक्यूमेंट्स का मकसद यह वेरिफाई करना है कि चांदी कहां से आ रही है, खासकर उन देशों से जहां भारत के साथ पहले से फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट (Free-Trade Agreement) हैं। हालांकि, अतिरिक्त डॉक्यूमेंटेशन और इम्पोर्ट कोटा की गणना को लेकर भ्रम ने सप्लाई चेन को काफी धीमा कर दिया है। ज्वैलर्स के लिए यह एक मुश्किल माहौल बना रहा है, क्योंकि वे आमतौर पर साल के इस समय में अपनी चांदी की इन्वेंट्री बढ़ाते हैं ताकि आने वाले त्योहारी सीजन और शादियों के लिए तैयार रह सकें, जब ज्वेलरी और चांदी के बर्तनों की डिमांड बढ़ जाती है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
मार्केट के लिए सबसे बड़ा सवाल अब सरकारी अप्रूवल की स्पीड है। चूंकि भारत में चांदी का घरेलू प्रोडक्शन बहुत कम है, इसलिए देश इम्पोर्ट पॉलिसी में बदलावों के प्रति बहुत संवेदनशील है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार कमेटी की मीटिंग्स की फ्रीक्वेंसी बढ़ाती है या पेंडिंग एप्लीकेशंस को क्लियर करने के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रिया को आसान बनाती है। अगर पीक वेडिंग सीजन के दौरान सप्लाई की कमी बनी रहती है, तो मैन्युफैक्चरर्स के लिए लागत बढ़ सकती है और घरेलू चांदी की कीमतों में ग्लोबल मार्केट की तुलना में ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। ज्वेलरी रिटेल या प्रीशियस मेटल डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़ी कंपनियों के निवेशक इन्वेंट्री लेवल और इन रेगुलेटरी बाधाओं के कम होने की खबरों पर नजर रख सकते हैं।
