सिल्वर ईटीएफ में 6% तक की तेजी, अमेरिकी यील्ड्स में आई नरमी

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AuthorNeha Patil|Published at:
सिल्वर ईटीएफ में 6% तक की तेजी, अमेरिकी यील्ड्स में आई नरमी

अमेरिकी ट्रेजरी के लिक्विडिटी बढ़ाने के फैसले के बाद भारतीय सिल्वर ईटीएफ (Silver ETF) में **4%** से ज्यादा की तेजी आई। इस कदम से 30-साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड गिरकर **5.18%** पर आ गई, जिससे कीमती धातुओं की मांग बढ़ी।

अमेरिकी ट्रेजरी के फैसले से सिल्वर ईटीएफ में रौनक

20 अगस्त, 2026 को भारतीय सिल्वर ईटीएफ (Silver ETF) में शानदार तेजी देखी गई, कई फंड्स में 4% से अधिक का उछाल आया। यह बढ़त अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट के एक बड़े ऐलान के बाद आई है। डिपार्टमेंट ने 10-से-30-साल की सरकारी बॉन्ड पर लिक्विडिटी सपोर्ट बायबैक ऑपरेशन का आकार दोगुना करने की योजना बनाई है। इस बड़े बदलाव को 9 सितंबर, 2026 से लागू किया जाएगा।

बॉन्ड यील्ड्स में नरमी, सिल्वर को मिला बूस्ट

जब अमेरिकी सरकार लिक्विडिटी बढ़ाने की घोषणा करती है, तो यह बॉन्ड मार्केट को स्थिर करने में मदद करता है। इस खबर के बाद, 30-साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड, जो कि ग्लोबल बॉरोइंग कॉस्ट का एक अहम पैमाना है, अपने हालिया 5.3% के स्तर से गिरकर 5.18% पर आ गई। चांदी (Silver) और सोने (Gold) जैसी कीमती धातुओं के लिए बॉन्ड यील्ड्स का गिरना अक्सर फायदेमंद होता है। इन धातुओं पर कोई ब्याज नहीं मिलता, इसलिए जब सरकारी बॉन्ड जैसी सुरक्षित संपत्तियों पर यील्ड गिरती है, तो सोना और चांदी रखने का आकर्षण बढ़ जाता है।

क्यों चांदी में दिखी ज्यादा तेजी?

टाटा, निप्पॉन, एचडीएफसी, एसबीआई और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल जैसे फंड हाउसेस के सिल्वर ईटीएफ ने सबसे ज्यादा बढ़त दर्ज की। मार्केट एक्सपर्ट्स अक्सर चांदी को सोने की तुलना में 'हाई बीटा' (Higher Beta) वाला मानते हैं। इसका मतलब है कि जब मार्केट का सेंटिमेंट बदलता है, तो चांदी की कीमतें सोने की तुलना में ज्यादा तेजी से ऊपर या नीचे जाती हैं। चांदी का इस्तेमाल निवेश के साथ-साथ इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग में भी होता है, इसलिए यह इकोनॉमिक पॉलिसी और लिक्विडिटी में बदलावों पर सोने की तुलना में ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया देती है। इस दिन सोने में 2% से 2.5% के बीच मामूली बढ़त देखी गई।

आगे क्या? जोखिम और अवसर

इस तत्काल सकारात्मक माहौल के बावजूद, निवेशकों को कुछ जोखिमों से सावधान रहना होगा। अगर शुरुआती उत्साह कम होता है, तो मार्केट में प्रॉफिट-टेकिंग (Profit-taking) यानी मुनाफावसूली देखी जा सकती है। इसके अलावा, ग्लोबल इकोनॉमिक माहौल अभी भी तनावपूर्ण बना हुआ है। अमेरिका की फिस्कल स्थिति पर भी सवाल उठ रहे हैं, और देश का कुल पब्लिक डेट $40 ट्रिलियन के पार चला गया है। यह एक ऐसा फैक्टर है जो लिक्विडिटी उपायों के लॉन्ग-टर्म असर को सीमित कर सकता है। जियो-पॉलिटिकल रिस्क (Geopolitical risks) और महंगाई का दबाव भी ग्लोबल कमोडिटी मार्केट के लिए अनिश्चितता पैदा कर रहा है।

आने वाले समय में, मार्केट पार्टिसिपेंट्स सितंबर में बायबैक प्रोग्राम की आधिकारिक शुरुआत और बॉरोइंग कॉस्ट को कंट्रोल करने में इसकी प्रभावशीलता पर नजर रखेंगे। निवेशक यह भी देखेंगे कि कीमती धातुएं संभावित प्राइस स्विंग्स (Price Swings) को कैसे झेलती हैं, क्योंकि आगे का रास्ता काफी हद तक आने वाले इकोनॉमिक डेटा और सेंट्रल बैंक की भविष्य की पॉलिसी पर निर्भर करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.