23 जून 2026 को भारतीय सिल्वर एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF) में 4% से 5% तक की भारी गिरावट देखी गई। यह गिरावट वैश्विक स्तर पर कीमतों में आई नरमी के बीच हुई, जिसे अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Fed) द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की बढ़ती उम्मीदों और मजबूत हो रहे अमेरिकी डॉलर ने हवा दी। खास बात यह है कि गोल्ड ईटीएफ की तुलना में सिल्वर ईटीएफ में यह गिरावट ज्यादा तेज रही।
क्या हुआ?
23 जून 2026 को, भारतीय निवेशकों को सिल्वर से जुड़े एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETFs) में बड़ी गिरावट का सामना करना पड़ा। अधिकांश फंडों में 4% से 5% तक की गिरावट दर्ज की गई। यह बिकवाली (selloff) एक व्यापक वैश्विक ट्रेंड का हिस्सा है, जहां चांदी की कीमतें इस साल की शुरुआत के स्तरों से नीचे फिसल गई हैं। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर, जुलाई 2026 के सिल्वर फ्यूचर्स में 3.18% की गिरावट आई और यह ₹2,26,850 प्रति किलोग्राम पर आ गया। वहीं, अगस्त 2026 के गोल्ड फ्यूचर्स में 1.21% की मामूली गिरावट देखी गई।
ग्लोबल रेट्स और डॉलर का चांदी पर असर
इस गिरावट का मुख्य कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की उम्मीद है। जब अमेरिकी केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाता है, तो अमेरिकी डॉलर आमतौर पर मजबूत होता है। चूंकि चांदी का मूल्य डॉलर में तय होता है, एक मजबूत डॉलर अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए इसे महंगा बना देता है, जिससे अक्सर इसकी वैश्विक मांग कम हो जाती है। इसके अलावा, चूंकि चांदी पर कोई ब्याज या डिविडेंड (dividend) नहीं मिलता, इसलिए बढ़ती ब्याज दरें इसे बॉन्ड या बचत खातों की तुलना में कम आकर्षक बना देती हैं, जो उच्च-दर वाले माहौल में बेहतर रिटर्न देने लगते हैं।
सोना और चांदी में अंतर
सोना और चांदी दोनों कीमती धातुएं हैं, लेकिन वे अक्सर बाजार के तनाव पर अलग-अलग प्रतिक्रिया करती हैं। सोने को मुख्य रूप से एक सुरक्षित-संपत्ति (safe-haven asset) के रूप में देखा जाता है, जिसका अर्थ है कि अनिश्चित समय में निवेशक अक्सर इसकी ओर भागते हैं। यही कारण है कि गोल्ड ईटीएफ में अपेक्षाकृत मजबूती दिखी, जो सिल्वर ईटीएफ में 4% से 5% की गिरावट की तुलना में लगभग 1.6% से 1.7% ही गिरे। दूसरी ओर, चांदी की दोहरी प्रकृति है; यह एक कीमती धातु होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण औद्योगिक धातु भी है। सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोटिव जैसे उद्योगों में इसके व्यापक उपयोग के कारण, चांदी आम तौर पर अधिक अस्थिर (volatile) होती है। जब आर्थिक विकास की चिंताएं या दर वृद्धि की चिंताएं बढ़ती हैं, तो औद्योगिक मांग पर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं, जिससे चांदी की कीमतों में सोने की तुलना में ज्यादा उतार-चढ़ाव आता है।
निवेशकों के लिए जोखिम
निवेशकों के लिए, हालिया मूल्य उतार-चढ़ाव चांदी में निहित उच्च अस्थिरता (volatility) को उजागर करता है। ब्लू-चिप शेयरों के विपरीत, जिनका मूल्य कमाई और डिविडेंड से समर्थित हो सकता है, कमोडिटी-आधारित ईटीएफ काफी हद तक वैश्विक बाजार की भावना, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और मैक्रो-इकोनॉमिक नीतियों से प्रेरित होते हैं। सिल्वर ईटीएफ रखने वालों के लिए जोखिम यह है कि वे अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बने रहेंगे। यदि फेड ब्याज दरों पर सख्त रुख बनाए रखता है, या यदि डॉलर मजबूत होता रहता है, तो चांदी की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए
आगे बढ़ते हुए, निवेशकों को कुछ प्रमुख संकेतकों पर नजर रखने की आवश्यकता हो सकती है। पहला, अमेरिकी मुद्रास्फीति (inflation) और रोजगार के आंकड़ों पर ध्यान दें, क्योंकि ये संख्याएं फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों पर निर्णयों को काफी हद तक प्रभावित करती हैं। दूसरा, यूएस डॉलर इंडेक्स (DXY) की निगरानी करें, क्योंकि बढ़ता हुआ डॉलर आमतौर पर कमोडिटी के लिए एक बाधा के रूप में कार्य करता है। अंत में, औद्योगिक मांग के दृष्टिकोण का निरीक्षण करें, क्योंकि चांदी का प्रदर्शन अक्सर वैश्विक विनिर्माण क्षेत्रों के स्वास्थ्य से जुड़ा होता है।
