ग्लोबल झटकों का असर, चांदी में ऐतिहासिक गिरावट
यह गिरावट शुक्रवार, 30 जनवरी 2026 को ग्लोबल सिल्वर की कीमतों में आई ऐतिहासिक 37% की भारी सेंध से शुरू हुई। एक समय $120 प्रति औंस के पार जा चुकी चांदी की कीमतें कुछ ही दिनों में $80 के स्तर तक लुढ़क गईं। इस भारी गिरावट की मुख्य वजह अमेरिकी डॉलर का अचानक मजबूत होना था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा केविन वॉर्श (Kevin Warsh) को अगला फेडरल रिजर्व चेयर नियुक्त करने की खबरों ने डॉलर को पंख लगा दिए। वॉर्श को एक सख्त मौद्रिक नीति (Hawkish Fed Chair) वाला माना जाता है, जिसने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता को बढ़ा दिया।
भारतीय बाजार पर गहरा असर, ETFs में भारी बिकवाली
इस ग्लोबल सेल-ऑफ (Sell-off) का असर भारतीय बाजारों पर भी साफ दिखा। भारत में सिल्वर ईटीएफ (Silver ETF) में जबरदस्त बिकवाली हुई। Nippon AMC Silver ETF में 12% की गिरावट दर्ज की गई, जबकि अन्य सिल्वर ईटीएफ (ETFs) भी 9% से 15% तक गिरे। यह सब तब हुआ जब रविवार, 1 फरवरी 2026 को यूनियन बजट (Union Budget) के लिए भारतीय शेयर बाजार खुले हुए थे।
मेटल दिग्गजों का ₹2 लाख करोड़ का नुकसान
चांदी की कीमतों में आई इस सुनामी का सीधा असर भारत के दिग्गज मेटल उत्पादकों पर पड़ा। Vedanta, Hindustan Zinc, Hindustan Copper, Hindalco Industries और NALCO जैसी कंपनियों का कुल मार्केट कैप शुक्रवार और रविवार को मिलाकर लगभग ₹2 लाख करोड़ तक कम हो गया। यह दर्शाता है कि ग्लोबल कमोडिटी के उतार-चढ़ाव का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है।
लीवरेज्ड पोजिशंस और फंड फ्लो का खेल
इस गिरावट का एक बड़ा कारण Nippon AMC Silver ETF में भारी लीवरेज्ड पोजिशंस (Leveraged Positions) का अनवाइंड होना भी था। 30 जनवरी 2026 तक, NSE MTF बुक पर यह ETF करीब ₹1,748.3 करोड़ की लीवरेज्ड पोजीशन के साथ सबसे आगे था। दिसंबर 2025 से इन पोजिशंस में कई गुना बढ़ोतरी देखी गई थी, और चांदी की कीमतों में आई अचानक गिरावट ने इन लीवरेज्ड निवेशकों को भारी नुकसान पहुंचाया। यह हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (HAL) के ₹1,442 करोड़ के लीवरेज्ड पोजिशंस से भी ज्यादा था।
मजबूत डॉलर और कमोडिटी का रिश्ता
एक तरफ जहां चांदी जैसी डॉलर-डिनॉमिनेटेड (Dollar-denominated) कमोडिटी गिरीं, वहीं अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) मजबूत हुआ। 1 फरवरी 2026 को DXY लगभग 97.1754 पर कारोबार कर रहा था। पिछले महीने में यह 1.27% और पिछले 12 महीनों में 10.84% तक कमजोर हुआ था, लेकिन अब इसमें मजबूती आई। यह मजबूत डॉलर कमोडिटी की कीमतों पर हमेशा दबाव बनाता है।
आगे क्या?
इस तीखी बिकवाली के बाद, निवेशकों में, खासकर लीवरेज्ड पोजिशंस रखने वालों में, सावधानी बरतना स्वाभाविक है। अमेरिकी डॉलर की चाल और फेडरल रिजर्व की मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) के संकेतों पर सबकी नजर रहेगी। चांदी की औद्योगिक मांग, खासकर सोलर और ईवी सेक्टर से, लंबी अवधि में इसे सपोर्ट करती है, लेकिन फिलहाल ग्लोबल मैक्रोइकॉनॉमिक (Macroeconomic) और जियोपॉलिटिकल (Geopolitical) फैक्टर इसे अस्थिर रख सकते हैं।