Silver ETF में आई गिरावट: निवेशकों का पैसा घटा, सट्टेबाजी का खेल खत्म!

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AuthorMehul Desai|Published at:
Silver ETF में आई गिरावट: निवेशकों का पैसा घटा, सट्टेबाजी का खेल खत्म!

भारतीय सिल्वर ईटीएफ (Silver ETF) के लिए अब कंसॉलिडेशन (Consolidation) का दौर शुरू हो गया है। जनवरी में जहां एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) **₹1.17 लाख करोड़** था, वहीं जुलाई तक यह घटकर **₹77,676 करोड़** रह गया। ट्रेडिंग वॉल्यूम में **90%** की भारी गिरावट से साफ है कि सट्टेबाजी का दौर थमा है, हालांकि लॉन्ग-टर्म निवेशकों की संख्या स्थिर बनी हुई है।

सट्टेबाजी का दौर थमा, अब कंसॉलिडेशन की बारी

भारतीय सिल्वर ईटीएफ (Silver ETF) बाजार में 2025 के शानदार प्रदर्शन के बाद 2026 में एक ठहराव देखने को मिल रहा है। पिछले साल जहां इस एसेट क्लास ने 161% का बंपर रिटर्न दिया था, वहीं इस साल यानी 2026 में अब तक का रिटर्न घटकर करीब 2.4% रह गया है। यह साफ तौर पर बाजार के बदलते सेंटीमेंट (Sentiment) का संकेत है।

AUM में 33% की गिरावट

इस मंदी का सबसे बड़ा असर फंड्स के टोटल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) पर दिखा है। जनवरी में जहां यह ₹1.17 लाख करोड़ के अपने चरम पर था, वहीं जुलाई तक इसमें 33% की गिरावट आई और यह ₹77,676 करोड़ पर आ गया। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि स्टॉक एक्सचेंजों पर ट्रेडिंग वॉल्यूम में 90% से ज्यादा की कमी आई है। यह दिखाता है कि जो शॉर्ट-टर्म सट्टेबाज (Speculators) कीमतों में तेजी ला रहे थे, वे अब दूसरे इंस्ट्रूमेंट्स (Instruments) की ओर बढ़ गए हैं।

लॉन्ग-टर्म निवेशक अभी भी मौजूद

ट्रेडिंग एक्टिविटी (Trading Activity) में भारी कमी के बावजूद, निवेशक फोलियो (Folio) की संख्या में स्थिरता यह बताती है कि कुछ निवेशक अभी भी चांदी को लॉन्ग-टर्म होल्डिंग (Long-term Holding) के तौर पर देख रहे हैं। ये निवेशक जल्दी पैसा बनाने के बजाय पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन (Portfolio Diversification) के लिए सिल्वर ईटीएफ का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, यह स्थिरता चांदी से जुड़े जोखिमों को कम नहीं करती, क्योंकि यह सोने से काफी अलग तरीके से काम करती है।

सोने से अलग है चांदी का मिजाज

सोने के विपरीत, जो मुख्य रूप से वैल्यू स्टोर (Store of Value) का काम करता है, चांदी की पहचान एक कीमती धातु होने के साथ-साथ एक इंडस्ट्रियल कमोडिटी (Industrial Commodity) के तौर पर भी है। इस दोहरी प्रकृति के कारण यह इकोनॉमिक साइकल्स (Economic Cycles) के प्रति अधिक संवेदनशील है। चांदी की मांग का एक बड़ा हिस्सा इंडस्ट्रियल इस्तेमाल से आता है, खासकर सोलर पैनल प्रोडक्शन में। इसलिए, ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) ट्रेंड्स में बदलाव या "सिल्वर-थ्रिफ्टिंग" (Silver-thrifting) यानी कंपनियों द्वारा चांदी के इस्तेमाल को कम करने जैसे कदम इसकी लॉन्ग-टर्म प्राइस पोटेंशियल (Price Potential) को प्रभावित कर सकते हैं।

मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर्स का असर

निवेशकों को चांदी की कीमतों को प्रभावित करने वाले मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर्स (Macroeconomic Factors) को भी ध्यान में रखना चाहिए। मजबूत अमेरिकी डॉलर (US Dollar) आमतौर पर चांदी के लिए एक बाधा (Headwind) बनता है, क्योंकि यह डॉलर के अलावा अन्य करेंसी का उपयोग करने वाले खरीदारों के लिए इसे महंगा बना देता है। इसके अलावा, चांदी से कोई यील्ड (Yield) नहीं मिलता, यानी यह कोई डिविडेंड (Dividend) या इंटरेस्ट (Interest) नहीं देती। ऐसे में, ग्लोबल सेंट्रल बैंक्स (Central Banks), जैसे कि यूएस फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की ब्याज दर नीतियों (Interest Rate Policies) में बदलाव के माहौल में, नॉन-यील्डिंग एसेट्स (Non-yielding Assets) पर दबाव आ सकता है।

वोलेटिलिटी (Volatility) का खास ध्यान रखें

वोलेटिलिटी (Volatility) चांदी की एक प्रमुख खासियत है। 2026 की शुरुआत में आई मार्केट करेक्शन (Market Correction) के दौरान, कुछ सिल्वर ईटीएफ में जनवरी और फरवरी में 20% तक की तेज गिरावट देखी गई थी। पिछले साल की तेजी के बाद मुनाफावसूली (Profit Booking) के कारण फरवरी 2026 में सेक्टर ने ₹826.3 करोड़ का पहला बड़ा नेट आउटफ्लो (Net Outflow) भी दर्ज किया था।

आगे चलकर, निवेशकों के लिए ग्लोबल इंडस्ट्रियल डिमांड (Industrial Demand) के ट्रेंड्स और सेंट्रल बैंक की ब्याज दर नीतियां मुख्य मॉनिटरेबल (Monitorables) होंगी। जैसे-जैसे सट्टेबाजी की गतिविधि कम हो रही है, सिल्वर ईटीएफ का प्रदर्शन अस्थायी बाजार की हाइप (Hype) के बजाय असली फिजिकल मेटल (Physical Metal) की सप्लाई-डिमांड (Supply-Demand) बैलेंस से अधिक जुड़ा रहेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.