बासमती निर्यातकों पर आसमान छूती लागत का बोझ
खाड़ी देशों (Gulf) तक बासमती चावल के निर्यात के लिए फ्रेट रेट्स (Freight Rates) में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। जो शिपिंग लागत पहले करीब $550 प्रति टन थी, वह अब बढ़कर $3,000 प्रति टन तक पहुंच गई है। यह अभूतपूर्व उछाल सिर्फ भू-राजनीतिक घटनाओं का नतीजा नहीं है, बल्कि यह भारत की शिपिंग और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था की पुरानी, गहरी खामियों को भी सामने लाता है। निर्यातकों का कहना है कि बासमती के दाम आमतौर पर $1,100-$1,300 प्रति टन के बीच होते हैं, ऐसे में लॉजिस्टिक्स ही सबसे बड़ा खर्च बन गया है। लागत में इजाफे का असर सिर्फ शिपिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें इनलैंड ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग की बढ़ी कीमतें और अनिश्चित बिलिंग के कारण वर्किंग कैपिटल (Working Capital) की जरूरत भी शामिल है।
लॉजिस्टिक्स की खामियां भारत की कॉम्पिटिटिवनेस को कर रहीं कमजोर
पश्चिम एशियाई शिपिंग मार्गों पर अस्थिरता ने भारत की समुद्री और माल ढुलाई प्रणाली की कमजोरियों को उजागर किया है। वैश्विक शिपिंग कंपनियों से अस्पष्ट शुल्कों (Charges) की शिकायतें आम हैं, जो अक्सर शिपमेंट के बाद ही सामने आते हैं। यह पारदर्शिता की कमी भारत की वैश्विक बाजार में कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचा रही है, जो भारत के ट्रिलियन-डॉलर एक्सपोर्ट इकोनॉमी बनने के लक्ष्य के लिए एक बड़ी चिंता है। अमेरिका और यूरोप में मांग में नरमी और बढ़ता संरक्षणवाद (Protectionism) भी निर्यात वृद्धि को बाधित कर रहा है। ऐसे में, लॉजिस्टिक्स की ऊंची लागत और जटिल नियमों के कारण भारत का निर्यात सुस्त पड़ गया है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, इन समस्याओं के चलते फाइनेंशियल ईयर 26 (FY26) तक $1 ट्रिलियन निर्यात का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, मर्चेंट शिपिंग एक्ट, 2025 (Merchant Shipping Act, 2025) समुद्री कानूनों को आधुनिक बनाने और व्यापार सुगमता बढ़ाने का लक्ष्य रखता है, लेकिन वास्तविक संकटों से निपटने में इसकी प्रभावशीलता एक बड़ी परीक्षा होगी।
छोटे व्यवसायों के लिए लॉजिस्टिक्स एक बड़ी चुनौती
यह शिपिंग संकट केवल एक अलग घटना नहीं है, बल्कि भारत की लॉजिस्टिक्स संरचना से जुड़ी गहरी समस्याओं का परिणाम है। देश का लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी एक बड़ा अवरोध बना हुआ है। खराब लास्ट-माइल कनेक्टिविटी, भीड़भाड़ वाले बंदरगाह और ट्रांजिट में देरी, खास तौर पर माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) यानी छोटे व्यवसायों के लिए मुश्किलें पैदा कर रही हैं। निर्यात क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इन छोटे उद्यमों के पास वैश्विक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तक सीमित पहुंच है। फ्रेट लागत में अचानक तेज वृद्धि का सामना करना उनके लिए बेहद मुश्किल है, जिसके चलते उन्हें परिचालन कम करना पड़ता है या महंगा एयर फ्रेट इस्तेमाल करना पड़ता है। मर्चेंट शिपिंग एक्ट, 2025 जैसे प्रयासों के बावजूद, नियामकीय प्रणाली में कागजी कार्रवाई का बिखराव और अनुपालन में देरी जैसी जटिलताएं वर्किंग कैपिटल को फंसाए रखती हैं।
निर्यात बढ़ाने के लिए तत्काल सुधारों की जरूरत
इन लॉजिस्टिक्स और नियामक समस्याओं को दूर करने के लिए बड़े सुधारों के बिना, भारत की निर्यात पहुंच का विस्तार करने, विशेष रूप से कृषि जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में, अनिश्चित बना रहेगा। भू-राजनीतिक तनावों से बढ़ी हुई प्रमुख शिपिंग बिंदुओं पर लगातार व्यवधान, एक मजबूत, अनुमानित और स्पष्ट शिपिंग प्रणाली की तत्काल आवश्यकता को दर्शाते हैं। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग (Directorate General of Shipping) द्वारा विवादों का मध्यस्थता करना और अधिकारियों की नियुक्ति जैसे अस्थायी उपाय उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन वे एक व्यवस्थित प्रणाली का स्थान नहीं ले सकते। ऐसी प्रणाली उचित प्रथाओं को सुनिश्चित करेगी, दर परिवर्तनों के लिए अग्रिम सूचना प्रदान करेगी और प्रभावी विवाद समाधान प्रदान करेगी। एक ट्रिलियन-डॉलर निर्यात अर्थव्यवस्था बनने की भारत की महत्वाकांक्षा केवल व्यापार सौदों पर ही नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण रूप से इसकी सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स की मजबूती और दक्षता पर भी निर्भर करती है।
