ट्रेडिंग बढ़ाने के लिए SEBI का अनोखा तरीका
SEBI का यह नया प्रस्ताव भारतीय एग्रीकल्चरल कमोडिटी डेरिवेटिव्स मार्केट में ट्रेडिंग की कमी को दूर करने के लिए लाया जा रहा है। अक्सर देखा गया है कि फिजिकल सेटलमेंट (Physical Settlement) के सख्त नियमों के कारण बहुत कम लोग ही इन डेरिवेटिव्स में ट्रेड कर पाते हैं। SEBI का मानना है कि कॉन्ट्रैक्ट्स को शुरुआत में फाइनेंशियल सेटलमेंट (Financial Settlement) के तौर पर ट्रेड करने की अनुमति देने से ज्यादा लोग इसमें हिस्सा ले सकेंगे। इससे एक्सचेंजों को डिलीवरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का भी समय मिलेगा।
कैसे काम करेगा नया सिस्टम?
इस नए सिस्टम के तहत, मक्का (Maize), मूंगफली (Groundnut) और मिर्च (Chilli) जैसे प्रमुख एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स के कॉन्ट्रैक्ट्स शुरू में फाइनेंशियल सेटलमेंट वाले इंस्ट्रूमेंट्स के रूप में ट्रेड होंगे। इससे ट्रेडर्स कॉन्ट्रैक्ट के डिटेल्स और प्राइस डिस्कवरी से परिचित हो पाएंगे, बिना तुरंत फिजिकल डिलीवरी की झंझट के।
जैसे ही किसी कॉन्ट्रैक्ट का एवरेज डेली ट्रेडेड वॉल्यूम (ADTV) या ओपन इंटरेस्ट (Open Interest) एक तय सीमा तक पहुंच जाएगा, या कॉन्ट्रैक्ट शुरू होने के दो साल बाद, जो भी पहले हो, तब से इसका मैंडेटरी फिजिकल सेटलमेंट शुरू होगा। यह स्ट्रैटेजी धीरे-धीरे ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ाने और यह सुनिश्चित करने पर केंद्रित है कि मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर फिजिकल सेटलमेंट के लिए तैयार हो।
क्यों बदला जा रहा है पुराना तरीका?
NCDEX और MCX जैसे एक्सचेंजों पर एग्रीकल्चरल कमोडिटीज के लिए सालों से फिजिकल सेटलमेंट एक अहम हिस्सा रहा है, जिसका मकसद स्पॉट मार्केट प्राइस से मेल खाना है। इसके बावजूद, कई एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स में ट्रेडिंग की मात्रा कम बनी हुई है। SEBI के पिछले कई प्रयासों के बावजूद यह समस्या बनी हुई थी। यह नया प्रस्ताव SEBI के रुख में एक बड़ा बदलाव दिखाता है, जो अब कॉन्ट्रैक्ट की शुरुआत से ही फिजिकल सेटलमेंट पर जोर देने की बजाय, लिक्विडिटी बनने का इंतजार करेगा।
क्या हैं जोखिम?
हालांकि यह नया तरीका ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ा सकता है, लेकिन इसमें कुछ ऑपरेशनल जोखिम भी हैं। इस सिस्टम की सफलता काफी हद तक एक्सचेंजों द्वारा वेयरहाउसिंग, क्वालिटी चेक और कुशल फिजिकल डिलीवरी के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर निर्भर करेगी। अगर फिजिकल सेटलमेंट शुरू होने पर ये सिस्टम फेल होते हैं, तो इससे प्राइस में बड़ी गिरावट या हेरफेर हो सकता है। ट्रेडर्स को फाइनेंशियल और फिजिकल सेटलमेंट के बीच प्राइस वोलेटिलिटी का सामना भी करना पड़ सकता है।
SEBI ने इस प्रस्ताव पर 2 जून तक पब्लिक कमेंट्स मांगे हैं। अगर यह योजना सफल होती है, तो यह भारत में एग्रीकल्चरल कमोडिटी डेरिवेटिव्स के जरिए प्राइस डिस्कवरी और रिस्क मैनेजमेंट के तरीके में बड़ा सुधार ला सकती है।
