रेगुलेटरी एक्शन: ETF सर्किट लिमिट में बदलाव की तैयारी
SEBI ने गोल्ड और सिल्वर Exchange-Traded Funds (ETFs) के कामकाज के तरीके में एक अहम प्रस्ताव पेश किया है। इस प्रस्ताव का मुख्य फोकस मौजूदा T-2 Net Asset Value (NAV) आधारित सर्किट लिमिट से हटकर T-1 रेफरेंस प्राइसिंग मैकेनिज्म पर जाना है। वर्तमान सिस्टम में, ETF की कीमतें पिछले दो दिन के NAV के हिसाब से तय होती हैं, जो मार्केट की रियल-टाइम चाल से थोड़ी पीछे रह जाती हैं। SEBI का मकसद इस गैप को कम करना है ताकि ETF की ट्रेडिंग प्राइस सीधे कमोडिटी की स्पॉट कीमतों से ज़्यादा सटीक रूप से मेल खा सके। Mirae Asset Investment Managers (India) के सिद्धार्थ श्रीवास्तव बताते हैं कि यह बदलाव ट्रेडिंग सिग्नल को बेहतर बनाने में मदद करेगा।
फेज-वाइज लिमिट्स और नई चुनौतियाँ
सिर्फ प्राइसिंग मैकेनिज्म ही नहीं, SEBI 20% के फिक्स सर्किट बैंड से भी आगे बढ़ने पर विचार कर रहा है। अब कमोडिटी ETFs के लिए 'फेज-वाइज' (phase-wise) सर्किट स्ट्रक्चर का प्रस्ताव है। श्रीवास्तव के अनुसार, अलग-अलग ग्लोबल और लोकल मार्केट के ट्रेडिंग घंटों के कारण, कमोडिटी ETFs पर एक जैसे नियम लागू करना मुश्किल होता है। ETFs को निवेशकों के लिए एक फ्लेक्सिबल टूल माना जाता है, जो रियल-टाइम प्राइस शिफ्ट के दौरान ट्रेड कर सकें, इसलिए समय पर एडजस्टमेंट बहुत ज़रूरी हैं। फेज-वाइज लिमिट्स से मार्केट में लिक्विडिटी (liquidity) के बिखराव का खतरा है, अगर इन्हें बारीकी से लागू नहीं किया गया।
निवेशकों की बंपर डिमांड
इन रेगुलेटरी बदलावों पर चल रही चर्चाओं के बीच, गोल्ड और सिल्वर ETFs में निवेशकों की डिमांड ज़बरदस्त बनी हुई है। पिछले महीने ही, गोल्ड ETFs में करीब ₹24,000 करोड़ का इनफ्लो (inflow) देखा गया, जबकि सिल्वर ETFs में ₹9,000 करोड़ से ज़्यादा का निवेश आया। दोनों गोल्ड और सिल्वर ETFs में कुल मिलाकर रोज़ाना करीब ₹8,000 करोड़ की लिक्विडिटी (liquidity) है, जो मार्केट में ज़ोरदार ट्रेडिंग एक्टिविटी को दिखाता है। खास बात यह है कि सिल्वर में ट्रेडिंग टर्नओवर गोल्ड से ज़्यादा है, जो शायद इसकी प्राइस वोलेटिलिटी (volatility) और बढ़ती इंडस्ट्रियल डिमांड को देखते हुए शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग और स्पेकुलेटिव इंटरेस्ट (speculative interest) का संकेत देता है। गोल्ड ETFs अभी भी पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन (diversification) और महंगाई या करेंसी डेप्रिसिएशन (depreciation) के खिलाफ हेज (hedge) के तौर पर पसंद किए जा रहे हैं।
कॉपर ETF और फिजिकल रिप्लीकेशन का सवाल
चर्चा में कॉपर ETF जैसे दूसरे कमोडिटी ETFs के विस्तार पर भी बात हुई। श्रीवास्तव ने बताया कि मौजूदा SEBI नियमों के तहत, ज़्यादातर ETFs ऐसी कमोडिटीज पर आधारित होते हैं जिनका फिजिकल रिप्लीकेशन (physical replication) संभव हो। कॉपर जैसी कमोडिटी के लिए, फिजिकल स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन और क्वालिटी की जिम्मेदारी एक 'बहुत बड़ा काम' होगा। ऐसे में, डेरिवेटिव-बेस्ड रिप्लीकेशन (derivative-based replication) एक रास्ता हो सकता है, हालांकि इसमें काउंटरपार्टी एक्सपोज़र (counterparty exposure) जैसे अपने रिस्क होंगे।
रेगुलेटरी लेग वर्सेज मार्केट स्पीड
SEBI का इरादा ETF की कीमतों को मार्केट रियलिटी से जोड़ने का सराहनीय है, लेकिन प्रस्तावित बदलावों में कुछ चुनौतियाँ भी हैं। T-2 से T-1 में जाना रियल-टाइम अलाइनमेंट की ओर एक कदम है, पर अगर कमोडिटी मार्केट में इंट्रा-डे (intra-day) बहुत ज़्यादा वोलेटिलिटी (volatility) आती है, तो यह T-1 एडजस्टमेंट से भी तेज़ हो सकती है। फेज-वाइज सर्किट लिमिट्स, जो मार्केट की बारीकियों को ध्यान में रखने के लिए बनाई गई हैं, उनमें लिक्विडिटी को टुकड़ों में बांटने और प्राइस डिस्कवरी (price discovery) को कम कुशल बनाने का खतरा है। रेगुलेटरी बदलावों से कभी-कभी लिक्विडिटी में अस्थायी एडजस्टमेंट होते हैं। बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि SEBI का नया फ्रेमवर्क उस डायनामिज्म (dynamism) को रोके नहीं, जिसने हाल ही में कमोडिटी ETFs में निवेशकों की भागीदारी को बढ़ावा दिया है।
मार्केट का नज़रिया और आगे की राह
आगे चलकर, SEBI के प्रस्तावित सर्किट लिमिट रिवीजन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन्हें कितनी आसानी से लागू किया जाता है और मार्केट कैसे प्रतिक्रिया देता है। विश्लेषकों का मानना है कि T-1 प्राइसिंग की ओर बढ़ना ETF स्ट्रक्चर के भीतर प्राइस डिस्कवरी (price discovery) को बेहतर बनाने के लिए एक सकारात्मक कदम है। हालांकि, कमोडिटी ETFs के लिए फेज-वाइज लिमिट्स को लागू करने में कुछ चिंताएं हैं, क्योंकि इससे उन निवेशकों के लिए ट्रेडिंग या लिक्विडिटी मैनेजमेंट जटिल हो सकता है जो विभिन्न कमोडिटी सब-सेक्टर्स में सक्रिय हैं। Mirae Asset Investment Managers (India) जैसे प्लेयर्स इस बदलते परिदृश्य में अहम भूमिका निभा रहे हैं, और उनकी राय से लगता है कि इंडस्ट्री ऐसे रेगुलेटरी एडजस्टमेंट के लिए तैयार है जो मार्केट एफिशिएंसी (efficiency) को बढ़ावा दें, लेकिन इसमें शामिल जटिलताओं को भी स्वीकार करें।