China की ओर कच्चे तेल के इम्पोर्ट (Import) के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा, और India की Russia से सप्लाई कम होने के चलते Russian और Iranian प्रोड्यूसर्स (Producers) ने कीमतों में भारी कटौती की है। यह डिस्काउंट वॉर (Discount War) ऐसे समय में हो रही है जब 2026 तक ग्लोबल ऑयल सरप्लस (Global Oil Surplus) बढ़ने का अनुमान है, जिससे मार्केट में सप्लाई का दबाव और बढ़ गया है। China के इंडिपेंडेंट रिफाइनर्स (Independent Refiners) की सीमित क्षमता और इंपोर्ट कोटा (Import Quota) सिस्टम में बदलाव इस पूरे समीकरण को और जटिल बना रहे हैं।
Russian Urals क्रूड (Crude) अब ICE Brent के मुकाबले लगभग $12 प्रति बैरल सस्ता मिल रहा है, जो पिछले महीने के $10 के डिस्काउंट से ज़्यादा है। वहीं, Iranian Light को ग्लोबल बेंचमार्क (Global Benchmark) से $11 कम में ऑफर किया जा रहा है, जबकि दिसंबर में यह अंतर $8-$9 के करीब था। ये बढ़ते फासले बाज़ार में अतिरिक्त सप्लाई को खपाने की कोशिश को दिखाते हैं। India द्वारा Russia से खरीद में 40% की गिरावट आने का अनुमान है। बाज़ार विश्लेषक 2026 तक 3.8 मिलियन बैरल प्रति दिन के बड़े ऑयल सरप्लस की आशंका जता रहे हैं। इस ओवरहैंग (Overhang) की वजह से प्रोड्यूसर्स को खरीदार ढूंढने के लिए, खासकर एशियाई बाज़ार में, गहरे डिस्काउंट देने पड़ रहे हैं।
OPEC+ की पोजीशन: Urals और Iranian Light पर ये भारी डिस्काउंट, Brent क्रूड जैसे बेंचमार्क रेट्स से बिल्कुल अलग हैं, जो 25 फरवरी 2026 को करीब $71.21 प्रति बैरल पर था। इतनी किफ़ायती कीमतों के बावजूद, OPEC+ ने अपने प्रोडक्शन (Production) में बढ़ोतरी पर रोक लगाने का फैसला बरकरार रखा है। इस रणनीति का मकसद मार्केट को स्थिर रखना है, लेकिन गहरे डिस्काउंट पर बेचने को मजबूर प्रोड्यूसर्स को इससे कोई राहत नहीं मिल रही है। Russia का प्रोडक्शन टारगेट करीब 9.6 mb/d है, जबकि OPEC+ ग्रुप ने बड़े प्रोडक्शन कट्स (Production Cuts) बनाए रखे हैं।
पुराना इतिहास और बड़े फैक्टर: ऐतिहासिक रूप से, सैंक्शन्ड (Sanctioned) क्रूड अक्सर भारी डिस्काउंट पर ट्रेड करता रहा है, लेकिन 2026 के लिए अनुमानित ग्लोबल ओवरसप्लाई (Global Oversupply) ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। Russia द्वारा सैंक्शन्स (Sanctions) को दरकिनार कर एक्सपोर्ट वॉल्यूम (Export Volume) बनाए रखने के लिए 'शैडो फ्लीट' (Shadow Fleet) का इस्तेमाल, ट्रेड प्रतिबंधों के पुराने दौर की याद दिलाता है। मिडिल ईस्ट (Middle East) में जियोपॉलिटिकल रिस्क (Geopolitical Risk) तेल की कीमतों में एक रिस्क प्रीमियम (Risk Premium) जोड़ते हैं, जिससे ऊपर की ओर दबाव बनता है। हालांकि, ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ (Global Economic Growth) और ट्रेड पॉलिसी (Trade Policy) को लेकर अनिश्चितता डिमांड को सीमित कर रही है। IEA के मुताबिक, 2026 में डिमांड ग्रोथ 850,000 b/d रहने की उम्मीद है, जिसमें ज्यादातर नॉन-OECD देशों का योगदान होगा, लेकिन यह प्रोडक्शन इंक्रीज़ (Production Increase) से कम रहने की आशंका है।
ईरान की मुश्किलें: Iran की एक्सपोर्ट स्ट्रैटेजी, भले ही हाल के सालों में बढ़ी हो और China उसका मुख्य खरीदार हो, लेकिन जियोपॉलिटिकल डेवलपमेंट (Geopolitical Development) के प्रति बेहद संवेदनशील है। अमेरिका की ओर से संभावित कार्रवाई या हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग रूट्स (Shipping Routes) में कोई रुकावट, इसकी एक्सपोर्ट क्षमता और प्राइसिंग पावर (Pricing Power) को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। डिस्काउंटेड सेल (Discounted Sale) पर निर्भरता, जो वॉल्यूम बढ़ने के बावजूद फ्लैट रेवेन्यू (Flat Revenue) दे रही है, अंदरूनी आर्थिक दबाव को दर्शाती है।
रूस का रेवेन्यू घाटा: जहां Russia अपने एक्सपोर्ट वॉल्यूम को युद्ध-पूर्व स्तरों से ऊपर बनाए हुए है, वहीं गहरे डिस्काउंट और सैंक्शन्स की वजह से उसका एनर्जी रेवेन्यू (Energy Revenue) काफी कम हो गया है। यह उसके युद्ध प्रयासों के लिए फंड को प्रभावित कर रहा है। 'शैडो फ्लीट' का इस्तेमाल करके सैंक्शन्स को दरकिनार करना, वॉल्यूम के लिहाज से भले ही कारगर हो, यह एक वित्तीय भेद्यता (Financial Vulnerability) को छुपाता है और रेगुलेटरी जांच (Regulatory Scrutiny) को न्योता देता है। Crude शिपमेंट से Russia की एक्सपोर्ट अर्निंग्स (Export Earnings) में साल-दर-साल 18% की गिरावट आई है।
चीन की सीमित खपतः China के इंडिपेंडेंट रिफाइनर्स, जिन्हें 'टीपॉट्स' (Teapots) भी कहा जाता है, ऐतिहासिक रूप से बाज़ार के लिए एक बफर (Buffer) का काम करते रहे हैं। लेकिन उनकी क्षमता सीमित है और यह सरकारी इंपोर्ट कोटे (Import Quota) के अधीन है। ये कोटे अब छोटे इंडिपेंडेंट्स से बड़े, इंटीग्रेटेड रिफाइनिंग-पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स (Integrated Refining-Petrochemical Complexes) को रीडिस्ट्रीब्यूट (Redistribute) किए जा रहे हैं। यह Beijing की प्राथमिकता को दिखाता है, जो सप्लाई सिक्योरिटी (Supply Security) और इंडस्ट्रियल कंसॉलिडेशन (Industrial Consolidation) पर है, न कि अतिरिक्त सैंक्शन्ड क्रूड को खपाने पर। यह स्ट्रक्चरल बदलाव (Structural Change) Russia और Iran के बढ़ते सप्लाई को टीपॉट्स द्वारा सोखने की लॉन्ग-टर्म संभावना को सीमित करता है।
स्टोरेज और सप्लाई की समस्या: China द्वारा विस्थापित (Displaced) क्रूड को पूरी तरह से अवशोषित (Absorb) करने में असमर्थता के कारण, बिना बिका तेल एशियाई जलक्षेत्रों में जमा हो रहा है। 2026 के लिए अनुमानित ग्लोबल सप्लाई सरप्लस (Global Supply Surplus) के साथ, यह बढ़ता इन्वेंटरी (Inventory) तब प्राइस कोलैप्स (Price Collapse) का जोखिम पैदा करता है जब स्टोरेज कैपेसिटी (Storage Capacity) अपनी सीमा तक पहुंच जाती है। IEA ने नोट किया कि 248 mb तेल 2025 में पानी पर जमा हुआ था, जिसमें सैंक्शन्ड तेल का एक बड़ा हिस्सा था।
भविष्य का नज़रिया: यह प्राइस वॉर तब तक टिकाऊ समाधान की ओर नहीं ले जाएगी जब तक कि जियोपॉलिटिकल हालात या China की इंपोर्ट नीतियां नहीं बदलतीं। मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से रिस्क प्रीमियम के ज़रिए तेल की कीमतों को सपोर्ट मिल सकता है, जो Iran की एक्सपोर्ट वायबिलिटी (Export Viability) पर असर डाल सकता है। इसके विपरीत, कूटनीतिक सफलता से ये प्रीमियम कम हो सकते हैं, लेकिन सप्लाई सरप्लस की मूल समस्या हल नहीं होगी। Russia का 'शैडो फ्लीट' और डिस्काउंटेड सेल पर जारी रहना, वॉल्यूम और रेवेन्यू मेंटेनेंस (Revenue Maintenance) पर केंद्रित रणनीति को दर्शाता है, लेकिन सैंक्शन्स की इवोल्यूशन (Evolution) के साथ इस तरीके की सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) पर सवालिया निशान है। China के लिए, बड़े इंटीग्रेटेड रिफाइनर्स को प्राथमिकता देना और इंपोर्ट कोटे का आवंटन, सैंक्शन्ड क्रूड के फ्लो (Flow) को तय करेगा। इसका मतलब है कि 'टीपॉट' की क्षमता, जो वर्तमान में डिस्काउंटेड बैरल प्राप्त कर रही है, Russia और Iran की एक्सपोर्ट चुनौतियों को पूरी तरह से सोखने की स्ट्रक्चरल सीमाएं रखती है।