भारतीय रुपया हुआ कमजोर, ब्रेंट क्रूड $92 के पार!

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AuthorNeha Patil|Published at:
भारतीय रुपया हुआ कमजोर, ब्रेंट क्रूड $92 के पार!

ग्लोबल मार्केट से मिले मिक्स्ड संकेतों के बीच भारतीय रुपया आज अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है। रुपये में गिरावट की मुख्य वजह ब्रेंट क्रूड ऑयल का दाम $92 प्रति बैरल के पार निकल जाना है।

तेल की कीमतों में आग, अमेरिका-ईरान में तनाव

अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ता तनाव इस तेजी का मुख्य कारण बताया जा रहा है। ईरान द्वारा इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर नियंत्रण के दावे और अमेरिका के आश्वासन के बावजूद, बाजार में अनिश्चितता का माहौल है। इसी का नतीजा है कि ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगातार चौथे दिन बढ़ी हैं और अब $92 का आंकड़ा पार कर गई हैं।

भारत पर पड़ेगा दोहरा मार

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है। ऐसे में जब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो आयात बिल काफी महंगा हो जाता है। इससे देश का ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) बढ़ता है और रुपये पर दबाव आता है। चूंकि भारत को तेल का भुगतान डॉलर में करना पड़ता है, इसलिए तेल की ऊंची कीमतें डॉलर की मांग बढ़ाती हैं, जिससे रुपये का मजबूत होना मुश्किल हो जाता है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, बाजार के जानकारों का मानना है कि तेल आयातकों की डॉलर की मांग अभी भी काफी ज्यादा है। ऐसे में RBI के लिए एक तरफ जहां विनिमय दर को स्थिर रखना है, वहीं दूसरी तरफ ऊर्जा की बढ़ी हुई लागत को बाजार में प्रतिबिंबित होने देना भी एक चुनौती है।

शेयर बाजार और कंपनियों के मुनाफे पर असर

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय शेयर बाजारों पर भी भारी पड़ रही हैं। इससे सेंसेक्स और निफ्टी में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। निवेशकों को चिंता है कि ऊर्जा की ऊंची लागत से महंगाई बढ़ेगी, जिससे आने वाले समय में मॉनेटरी पॉलिसी पर दबाव पड़ सकता है।

कई भारतीय कंपनियों के लिए यह स्थिति उनके प्रॉफिट मार्जिन के लिए बड़ा खतरा है। एविएशन, मैन्युफैक्चरिंग और पेंट्स जैसे सेक्टर पर इसका सीधा असर पड़ता है, क्योंकि वे कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी को आसानी से ग्राहकों पर नहीं डाल पाते। इसके अलावा, रुपये के कमजोर होने से डॉलर-डेनॉमिनेटेड कर्ज का भुगतान भी महंगा हो जाता है, जिसका असर उन कंपनियों की वित्तीय सेहत पर पड़ सकता है जिन पर विदेशी कर्ज ज्यादा है।

फिलहाल, निवेशकों की नजर कच्चे तेल की कीमतों पर बनी हुई है। वे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी किसी भी तनाव में कमी, RBI के बाजार हस्तक्षेप की निरंतरता और आने वाले महंगाई के आंकड़ों पर बारीकी से नजर रखेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.