आज के शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले **11** पैसे गिरकर **96.36** पर आ गया। लाल सागर और मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी इस गिरावट की मुख्य वजह है। निवेशक तेल आयात की लागतों को लेकर चिंतित हैं और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के मुद्रा की अस्थिरता को प्रबंधित करने के संभावित हस्तक्षेप पर नज़र बनाए हुए हैं।
Detailed Coverage
तेल की कीमतों और रुपये पर असर
डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट की मुख्य वजह वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज़ी है। बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 1.18% बढ़कर $92.08 प्रति बैरल तक पहुंच गया है। भारत अपनी तेल की ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो आयातकों को अधिक डॉलर की ज़रूरत पड़ती है। इस बढ़ी हुई मांग का सीधा असर रुपये पर पड़ता है और यह दबाव में आ जाता है।
भू-राजनीतिक तनाव और बाज़ार का सेंटिमेंट
लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य से शिपिंग की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएं बाज़ार में भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम को बढ़ा रही हैं। जब भी क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ती है, तो निवेशक अक्सर 'सुरक्षित निवेश' माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर की ओर रुख करते हैं। डॉलर इंडेक्स, जो ग्रीनबैक को अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले ट्रैक करता है, 101.15 पर अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है, जो डॉलर के प्रति इस वरीयता को दर्शाता है।
RBI की भूमिका
बाज़ार सहभागियों की निगाहें इस बात पर हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस उतार-चढ़ाव को कैसे संभालता है। केंद्रीय बैंक अक्सर सरकारी बैंकों के ज़रिए विदेशी मुद्रा बाज़ार में दखल देकर तरलता (liquidity) प्रदान करता है, जिससे रुपये में तेज और एकतरफा गिरावट को रोका जा सके। हालांकि, इन सक्रिय उपायों ने ऐतिहासिक रूप से रुपये को सहारा दिया है और व्यवस्थित स्थितियां बनाए रखी हैं, लेकिन तेल की ऊंची कीमतों का जारी रहना एक ऐसा कारक है जो डॉलर के मुकाबले रुपये की रिकवरी की क्षमता को सीमित कर सकता है। निवेशक केंद्रीय बैंक से और संकेतों का इंतज़ार करेंगे, साथ ही वैश्विक तेल बेंचमार्क में किसी भी बदलाव पर भी नज़र रखेंगे जो घरेलू आयात बिल को प्रभावित कर सकता है।
