उत्पादन में इतनी बड़ी गिरावट क्यों?
यूएसडीए (USDA) के अनुमान के मुताबिक, 2026-27 फाइनेंशियल ईयर में ग्लोबल चावल उत्पादन 5.0 मिलियन टन घटकर 537.8 मिलियन टन पर आ सकता है। यह 2015/16 के बाद उत्पादन में पहली बड़ी गिरावट होगी। इस गिरावट की वजह भू-राजनीतिक (geopolitical) तनाव और जलवायु संबंधी चुनौतियां हैं। ईरान से जुड़े तनाव के कारण ऊर्जा और उर्वरक की लागतें काफी बढ़ गई हैं, जो चावल उगाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसी वजह से किसान बुवाई कम कर रहे हैं। भारत, म्यांमार और अमेरिका जैसी जगहों पर फसल 15% तक सिकुड़ने की आशंका है। अमेरिका में अकेले 15% की गिरावट का अनुमान है, जिसका कारण आर्थिक दबाव और दूसरी फसलों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते बुवाई क्षेत्र में आई कमी है।
सप्लाई को लेकर चिंताएं तब और बढ़ गईं जब 'अल नीनो' (El Niño) का पैटर्न बनता दिख रहा है। अनुमान है कि यह दक्षिण पूर्व एशिया और भारत में मानसून को बाधित कर सकता है, जिससे बारिश कम हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से, अल नीनो की घटनाओं के कारण भारत के खाद्य अनाज उत्पादन में बड़ी गिरावट आई है, जिसमें खरीफ चावल उत्पादन में औसतन 7% की कमी दर्ज की गई है। इन बढ़ी हुई इनपुट लागतों, सप्लाई चेन को प्रभावित करने वाली भू-राजनीतिक अस्थिरता और प्रतिकूल मौसम का यह मेल वैश्विक चावल की उपलब्धता को लेकर गंभीर तस्वीर पेश करता है। शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (CBOT) रफ राइस फ्यूचर्स (Rough Rice futures) में ओपन इंटरेस्ट (open interest) में पिछले साल के मुकाबले बढ़ोतरी देखी गई है, जो बाजार का बढ़ा हुआ ध्यान दिखाती है।
कीमतों में उछाल और रिकॉर्ड व्यापार
उत्पादन में इस अनुमानित गिरावट के साथ-साथ 541.4 मिलियन टन की रिकॉर्ड वैश्विक खपत के कारण दुनिया भर के चावल भंडार में कमी आएगी। सप्लाई के टाइट होने से कीमतें पहले ही बढ़नी शुरू हो गई हैं। थाई सफेद चावल की थोक कीमत, जो एक महत्वपूर्ण बेंचमार्क है, मार्च के अंत से लगभग 15% तक बढ़ चुकी है। सीबीओटी (CBOT) फ्यूचर्स में भी पिछले हफ्ते 8% का उछाल देखा गया। संयुक्त राष्ट्र (UN) के खाद्य कमोडिटी प्राइस इंडेक्स (food commodity price index) में भी यह दबाव दिख रहा है, जो अप्रैल 2026 में तीन साल के उच्च स्तर पर पहुंच गया।
कम उत्पादन के बावजूद, 2026/27 में वैश्विक चावल व्यापार 63 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। इसकी मुख्य वजह सब-सहारा अफ्रीका (Sub-Saharan Africa) से बढ़ती मांग है, जिससे 19.3 मिलियन मीट्रिक टन का रिकॉर्ड आयात होने की उम्मीद है। दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक भारत भी नए निर्यात रिकॉर्ड बनाने की उम्मीद कर रहा है, जो वैश्विक व्यापार का लगभग 40% होगा। वियतनाम, थाईलैंड और पाकिस्तान से भी शिपमेंट बढ़ने की संभावना है। हालांकि, अमेरिका में उत्पादन की चुनौतियों के चलते निर्यात में कमी आ सकती है।
वैश्विक खाद्य प्रणाली की कमजोरियां उजागर
चावल बाजार की मौजूदा गतिशीलता वैश्विक कृषि में संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करती है। ईरान संघर्ष का उर्वरक और ऊर्जा की कीमतों पर असर दिखाता है कि हम कुछ भू-राजनीतिक क्षेत्रों और व्यापार मार्गों पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, जो व्यवधानों के प्रति संवेदनशील हैं। ऊर्जा के ये झटके प्रतिगामी (regressive) हैं और निम्न-आय वाले देशों तथा उन परिवारों को असमान रूप से प्रभावित करते हैं, जिनके खर्च का एक बड़ा हिस्सा भोजन पर होता है। इससे आय असमानता बढ़ सकती है।
इसके अलावा, वैश्विक अनाज बाजार 'पतला' (thin) है, जिसका मतलब है कि उत्पादन का एक छोटा हिस्सा ही सीमाओं के पार जाता है। यह सप्लाई या मांग में छोटे बदलावों से कीमतों में बड़े उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील है। उदाहरण के लिए, अमेरिका का चावल क्षेत्र आर्थिक दबाव और प्रतिस्पर्धी फसलों के कारण उत्पादन में 15% की अनुमानित गिरावट का सामना कर रहा है। इस सीजन में औसत खेत मूल्य $13.50 प्रति सौ क्विंटल तक बढ़ने की उम्मीद है। वहीं, ब्राजील में 2026/27 में चावल उत्पादन में मामूली वृद्धि का अनुमान है।
भविष्य का आउटलुक: लगातार बढ़ती कीमतें
आउटलुक बताता है कि सप्लाई की सीमाओं और मजबूत आयात मांग, खासकर अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया से, के कारण चावल की कीमतों में लगातार तेजी जारी रहेगी। विश्लेषकों का अनुमान है कि 2026/27 में अमेरिका में औसत खेत मूल्य पिछले साल के मुकाबले बढ़कर $13.50 प्रति सौ क्विंटल तक पहुंच सकता है। हालांकि विश्व बैंक (World Bank) 2026 में कृषि मूल्य सूचकांकों (agricultural price indices) में मामूली समग्र गिरावट की उम्मीद करता है, लेकिन चावल पर भू-राजनीतिक और जलवायु कारकों का विशेष दबाव इस क्षेत्र के लिए एक अलग रुझान की ओर इशारा करता है। अल नीनो का बदलता पैटर्न और भू-राजनीतिक स्थिति आने वाले साल में उत्पादन, व्यापार और मूल्य स्थिरता को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक बने रहेंगे। इससे इस महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ पर लगातार महंगाई बनी रह सकती है।
