इक्विटी डेरिवेटिव्स पर भारी-भरकम Securities Transaction Tax (STT) लगने के बाद अब रिटेल ट्रेडर्स कमोडिटी मार्केट का रुख कर रहे हैं। MCX जैसे एक्सचेंज पर भले ही टैक्स कम है, लेकिन डेरिवेटिव ट्रेडिंग का रिस्क यहां भी बरकरार है।
भारत के रिटेल ट्रेडर्स अब तेजी से अपनी पूंजी को इक्विटी इंडेक्स डेरिवेटिव्स से हटाकर कमोडिटी मार्केट में लगा रहे हैं। यह बदलाव 1 अप्रैल, 2026 से इक्विटी डेरिवेटिव्स पर लागू हुए बढ़े हुए STT के बाद देखने को मिला है, जिसने ट्रेडर्स की जेब पर बड़ा असर डाला है।
टैक्स का खेल (Tax Disparity)
इस बदलाव की मुख्य वजह ट्रांजैक्शन कॉस्ट है। मौजूदा नियमों के तहत, इक्विटी ऑप्शंस पर STT बढ़कर 0.15% और फ्यूचर्स पर 0.05% हो गया है। इसके मुकाबले, कमोडिटी ट्रांजैक्शन पर अब भी 0.05% की दर से ही टैक्स लग रहा है। जो ट्रेडर्स दिन भर में कई बार ट्रेड करते हैं, उनके लिए यह अंतर उनके नेट प्रॉफिट पर भारी चोट कर रहा है।
जोखिम को नजरअंदाज न करें
टैक्स में बचत के चक्कर में ट्रेडर्स यह भूल रहे हैं कि एसेट क्लास बदलने से डेरिवेटिव ट्रेडिंग का रिस्क कम नहीं होता। कमोडिटी जैसे एनर्जी, बुलियन और मेटल्स में जबरदस्त वोलैटिलिटी (Volatility) होती है। 2026 फाइनेंशियल ईयर का डेटा डराने वाला है, जहां इक्विटी डेरिवेटिव्स में 88% रिटेल ट्रेडर्स को कुल ₹91,685 करोड़ का नुकसान हुआ। इतना ही नहीं, इक्विटी F&O सेगमेंट में सक्रिय ट्रेडर्स की संख्या में 20% की गिरावट आई है।
आगे की राह
Multi Commodity Exchange of India (MCX) पर वॉल्यूम बढ़ने की एक वजह इसके ट्रेडिंग आवर्स का लंबा होना भी है, जिससे बाजार बंद होने के बाद भी सट्टेबाजी के मौके मिलते हैं। हालांकि, रेगुलेटर्स की नजरें अब कमोडिटी मार्केट पर भी हैं। अगर यहां भी नुकसान का सिलसिला थमा नहीं, तो इक्विटी की तरह यहां भी वीकली एक्सपायरी जैसे कड़े नियम लागू किए जा सकते हैं। ट्रेडर्स को यह ध्यान रखना चाहिए कि कम टैक्स का मतलब कम रिस्क नहीं होता।
