त्योहारी सीजन से पहले आम उपभोक्ताओं को अभी भी चीनी के लिए **₹60** प्रति किलो से ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं, जबकि थोक कीमतों में **20%** तक की कमी आई है। दुकानदार पुराना महंगा स्टॉक खत्म करने के लिए कीमतें कम करने से बच रहे हैं, जिससे बाजार में एक बड़ा अंतर पैदा हो गया है।
भारतीय शुगर मार्केट में इस वक्त एक अजीब स्थिति बनी हुई है। अगस्त के अंत से मिल-गेट और थोक भाव में 20% की गिरावट आई है, लेकिन बड़े शहरों में रिटेल कीमतें अभी भी ₹60 से ₹70 प्रति किलो के आसपास बनी हुई हैं। यह अंतर न केवल आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है, बल्कि शुगर इंडस्ट्री के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है।
रिटेलर्स की क्या है मजबूरी?
दुकानदार कीमतें कम करने में इसलिए हिचकिचा रहे हैं क्योंकि वे उस पुराने स्टॉक को क्लियर करना चाहते हैं जिसे उन्होंने ऊंचे दाम पर खरीदा था। इस वजह से कमोडिटी मार्केट में नरमी के बावजूद रिटेल शेल्फ पर चीनी के दाम स्थिर बने हुए हैं। कई शहरों में लोग अब कम मात्रा में चीनी खरीद रहे हैं, जिससे डिमांड पर भी असर दिखने लगा है।
सरकारी दखल और चुनौतियां
बढ़ती कीमतों को कंट्रोल करने के लिए सरकार ने 1 सितंबर से बल्क कंज्यूमर्स पर 15 दिनों की स्टॉक लिमिट लगा दी है और 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की इजाजत दी है। ये कदम सप्लाई को सुचारू रखने के लिए हैं, लेकिन इससे प्रोड्यूसर्स पर रेगुलेटरी दबाव बढ़ गया है।
2025-26 के उत्पादन पर असर
खराब मौसम और फसल को हुए नुकसान के चलते 2025-26 के लिए शुगर प्रोडक्शन का अनुमान घटाकर 306 लाख मीट्रिक टन कर दिया गया है। सरकार ने मिलों को 15 अक्टूबर से नया पेराई सीजन शुरू करने का आदेश दिया है, जिससे कंपनियों के लिए सप्लाई और लागत के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा है। यदि आने वाले त्योहारों में डिमांड उम्मीद से कम रही, तो मिलों का इन्वेंट्री बोझ बढ़ सकता है, जिससे उनके मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा।
