मूल्यांकन का खेल
भले ही RBI के सोने के भंडार का मूल्य ₹11 लाख करोड़ तक पहुंच गया हो, लेकिन सच्चाई यह है कि इसमें भारी खरीदारी का हाथ नहीं है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोने की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में उछाल और रुपये के कमजोर होने से यह मूल्य 64% बढ़ा है। असल में, RBI ने पिछले बारह महीनों में 1 मीट्रिक टन से भी कम सोना खरीदा है, जो कि चीन और तुर्की जैसे देशों के सेंट्रल बैंकों की आक्रामक खरीदारी से बिल्कुल विपरीत है।
संप्रभु नियंत्रण और स्वदेश वापसी
सबसे बड़ी खबर सोने की खरीदारी में नहीं, बल्कि उसके ठिकाने में है। वित्तीय वर्ष 2025-26 तक 168.06 मीट्रिक टन सोना भारत के घरेलू वॉल्ट्स में लाया जाएगा। यह एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि अब तक RBI अपना ज्यादातर सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड जैसे विदेशी बैंकों में रखता आया है। यह कदम भू-राजनीतिक जोखिमों और संभावित संपत्ति जब्त होने के डर से उठाया जा रहा है। 367 टन से अधिक सोना भारत में रखने का मतलब है कि सरकार विदेशी तिजोरियों की सुविधा से ज्यादा अपनी संपत्ति पर संप्रभु नियंत्रण को महत्व दे रही है, जिससे जनता का भरोसा भी बढ़ेगा।
चिंताजनक संकेत
सोने की कीमत में बढ़ोतरी के सहारे रिजर्व को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना RBI की बैलेंस शीट पारदर्शिता के लिए एक छिपा हुआ जोखिम है। अगर सोने की कीमतें गिरती हैं या रुपया मजबूत होता है, तो यह रिजर्व तेजी से घट सकता है। इसके अलावा, रिकॉर्ड ऊंचाई पर चल रहे सोने के भावों के बीच खरीदारी को धीमा करना यह दर्शाता है कि RBI खुद को बाजार से बाहर कर रहा है। संस्थागत निवेशकों के विपरीत, RBI के कभी खरीदने और कभी न खरीदने के पैटर्न से लगता है कि वह मौजूदा कीमतों पर विश्वास नहीं कर पा रहा है। अगर फिजिकल खरीदारी की यही स्थिति जारी रहती है, तो देश वैश्विक रिजर्व विविधीकरण की दौड़ में पिछड़ सकता है।
व्यापक आर्थिक प्रभाव
सोने को घरेलू स्तर पर लाने से उच्च-सुरक्षा वाले बुनियादी ढांचे और गोल्ड-रिफाइनिंग मानकों में बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। आगे चलकर, फोकस सिर्फ सोने को जमा करने से हटकर इन घरेलू भंडारों के प्रबंधन पर जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक रुपया दबाव में रहेगा, तब तक सोने के मूल्यांकन लाभ का उपयोग वित्तीय ताकत दिखाने के लिए किया जाता रहेगा, भले ही जमीनी हकीकत वही रहे।
