विदेशी मुद्रा भंडार में बदलाव
विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव के चलते RBI ने सोने की बिकवाली का बड़ा कदम उठाया है। आमतौर पर केंद्रीय बैंक सोने को सुरक्षित निवेश मानते हुए जमा करते हैं, लेकिन डॉलर की तत्काल जरूरत के कारण RBI को यह रणनीति बदलनी पड़ी। सोने को विदेशी मुद्रा में बदलकर, RBI फिलहाल विदेशी मुद्रा की जरूरत को पूरा कर रहा है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) लगातार बढ़ रहा है, जिसका मुख्य कारण कच्चे तेल के बढ़ते आयात बिल हैं।
आर्थिक दांव-पेंच और बाजार पर असर
पिछले कुछ सालों के विपरीत, मौजूदा हालात भारतीय रिजर्व बैंक के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। ईरान से जुड़ी सप्लाई चेन में गड़बड़ी के कारण ऊर्जा की ऊंची कीमतें भारत की विदेशी मुद्रा की जरूरत को और बढ़ा रही हैं। हालांकि, रुपया अभी भी क्षेत्रीय मुद्राओं की तुलना में मजबूत दिख रहा है, लेकिन असलियत थोड़ी चिंताजनक है। इसके अलावा, RBI ने चांदी के आयात पर भी रोक लगा दी है, खासकर हाई-प्यूरिटी वाले ग्रेन और पाउडर फॉर्मेट पर। यह कदम विदेशी मुद्रा के बाहर जाने को रोकने का एक और प्रयास है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये उपाय भले ही अल्पकालिक स्थिरता के लिए जरूरी हों, लेकिन ये अक्सर ब्याज दरों में बढ़ोतरी जैसे बड़े नीतिगत बदलावों का संकेत होते हैं ताकि विदेशी पूंजी के पलायन को रोका जा सके।
विश्लेषकों की चिंताएं
कई संस्थागत निवेशक मुद्रा को सहारा देने के लिए संपत्ति बेचने को एक अस्थायी उपाय मानते हैं, न कि कोई स्थायी समाधान। सोने के भंडार को कम करके, केंद्रीय बैंक असल में अपने अंतिम सुरक्षा कवच को कमजोर कर रहा है। अगर पश्चिम एशिया में संघर्ष और बढ़ता है, तो आकर्षक कीमतों पर सोना वापस खरीदने का मौका खत्म हो सकता है, जिससे देश का रिजर्व बेस कमजोर हो जाएगा। इसके अलावा, चांदी के आयात पर प्रशासनिक रोक यह संकेत देती है कि केंद्रीय बैंक के पास पारंपरिक रास्ते सीमित हो रहे हैं। इतिहास गवाह है कि जब रेगुलेटर फिजिकल कमोडिटी के आयात पर नकेल कसते हैं, तो यह डॉलर के बड़े पैमाने पर बहिर्वाह (outflow) को लेकर उनकी गहरी चिंता को दर्शाता है।
आगे की राह
वित्तीय बाजार अब गवर्नर शक्तिकांत दास के अगले नीतिगत निर्देशों पर टकटकी लगाए हुए हैं। उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक मुद्रा के पतन को रोकने और विकास को नुकसान पहुंचाने वाली उधारी लागत में बढ़ोतरी से बचने के बीच एक संतुलन बनाएगा। यदि विदेशी पूंजी का बहिर्वाह जारी रहता है, तो ब्याज दरों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी की संभावना बढ़ जाती है, जो शेयर बाजारों के लिए एक बड़ी बाधा साबित होगी। फिलहाल, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) विदेशी मुद्रा भंडार की निरंतर कमी की भरपाई कर सकता है, या आने वाले महीनों में और अधिक रक्षात्मक परिसंपत्तियों की बिकवाली की आवश्यकता होगी।
