एल नीनो (El Nino) की मार और कम मानसून के चलते देश में धान की कीमतों में भारी उछाल आया है। प्रीमियम धान का भाव सरकारी MSP से **₹1,000** प्रति क्विंटल ऊपर पहुंच गया है, जिससे महंगाई का खतरा बढ़ गया है।
उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका
मानसून की कमी ने कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे बड़े कृषि हब को बुरी तरह प्रभावित किया है। अनुमान है कि इस साल खरीफ चावल का कुल उत्पादन पिछले साल के 123.93 मिलियन टन के मुकाबले कम से कम 10 मिलियन टन गिर सकता है। धान की खेती का दायरा भी करीब 4% घटकर 426.81 लाख हेक्टेयर रह गया है, जिससे बाजार में सप्लाई की भारी किल्लत देखी जा रही है।
बाजार की बदली चाल
सप्लाई चेन में अनिश्चितता का आलम यह है कि मिलर्स ने अब अपने भाव की वैलिडिटी को घटाकर मात्र कुछ घंटों का कर दिया है। सोना मसूरी और कोलम जैसी लोकप्रिय किस्मों की कमी के कारण अब खरीदार बिहार की कतरनी और यूपी की सरवती जैसे विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। किसान भी अब गोबिंद भोग जैसी वैरायटी पर फोकस कर रहे हैं क्योंकि उसमें रिटर्न बेहतर मिल रहा है।
FCI का बफर स्टॉक और RBI पर दबाव
सितंबर तक फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) के पास 39.05 मिलियन टन चावल और इतना धान है जिससे 30.75 मिलियन टन चावल और बन सकता है। यह स्टॉक एक सुरक्षा कवच तो है, लेकिन खुले बाजार में प्रीमियम अनाज की कमी से बढ़ रही महंगाई को पूरी तरह नहीं रोक पा रहा है।
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा चिंता का विषय कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) है। अगर चावल जैसी जरूरी चीजों के दाम नहीं थमते, तो यह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के ब्याज दरों पर लिए जाने वाले फैसलों को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, एफएमसीजी सेक्टर की कंपनियों पर मार्जिन का दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि लागत बढ़ने पर उन्हें कीमतें बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। बाजार अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए है कि क्या सरकार निर्यात पर पाबंदी या स्टॉक लिमिट जैसे सख्त कदम उठाएगी।
