जून 2026 में भारतीय निवेशकों ने गोल्ड और सिल्वर एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETFs) में करीब **₹7,800 करोड़** का भारी निवेश किया है। यह पिछले कुछ महीनों के आउटफ्लो (Outflow) के ट्रेंड को उलट देता है। यह निवेश तब आया है जब सोने की कीमतों में **9.7%** और चांदी में **14.4%** की बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी। एक्सपर्ट्स का मानना है कि निवेशकों ने इस गिरावट को खरीदारी का मौका माना, जिसमें मल्टी-एसेट फंड्स (Multi-Asset Funds) का योगदान भी अहम रहा।
क्या हुआ?
प्रीशियस मेटल (Precious Metal) एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) में निवेशकों की दिलचस्पी जून 2026 में एक बार फिर लौट आई है। डेटा के मुताबिक, इन फंड्स में कुल ₹7,800 करोड़ का इनफ्लो (Inflow) देखने को मिला है। इसमें सिल्वर ETFs में करीब ₹4,900 करोड़ और गोल्ड ETFs में ₹2,900 करोड़ का निवेश हुआ। यह एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि इससे पहले सिल्वर ETFs में लगातार चार महीने से आउटफ्लो (Outflow) हो रहा था, और गोल्ड ETFs में पिछले एक साल से ज़्यादा समय में पहली बार मई में आउटफ्लो देखा गया था।
कीमतों में क्यों आई गिरावट?
निवेशकों का यह बढ़ा हुआ इंटरेस्ट धातुओं की कीमतों में आई भारी गिरावट के साथ मेल खाता है। जून महीने में, घरेलू सोने की कीमतों में लगभग 9.7% की कमी आई, जबकि चांदी की कीमतों में 14.4% की गिरावट दर्ज की गई। इस उतार-चढ़ाव की मुख्य वजहें ग्लोबल मार्केट, खासकर अमेरिका से जुड़ी थीं। मजबूत होता अमेरिकी डॉलर और बढ़ते अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स (US Treasury Yields) ने सोने जैसी नॉन-इंटरेस्ट बेयरिंग एसेट्स (Non-interest-bearing assets) को ग्लोबल निवेशकों के लिए कम आकर्षक बना दिया। इसके अलावा, मार्केट की यह उम्मीद कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रख सकता है, ने भी धातुओं के दामों पर दबाव डाला। भू-राजनीतिक तनावों में कमी आने से भी निवेशकों का सेफ-हेवन (Safe-haven) के तौर पर सोने में निवेश करने का रुझान कम हुआ।
इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स की भूमिका
जहां रिटेल निवेशक (Retail investors) अक्सर कीमतों में गिरावट का फायदा उठाकर खरीदारी करते हैं, वहीं प्रोफेशनल मनी मैनेजर्स (Professional money managers) भी इन फ्लोज़ (Flows) को प्रभावित कर रहे हैं। वैल्यूमेट्रिक्स टेक्नोलॉजीज (ValueMetrics Technologies) के को-फाउंडर मन्नू जैन (Manuj Jain) ने बताया कि मल्टी-एसेट फंड्स (Multi-asset funds) - जो इक्विटी, डेट और गोल्ड जैसी विभिन्न एसेट क्लास (Asset classes) में निवेश करते हैं - के बढ़ने से ETFs में निवेश का एक नया रास्ता खुला है। इन फंड मैनेजर्स ने संभवतः कीमतों में गिरावट के दौरान अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस (Rebalance) करने के लिए गोल्ड और सिल्वर ETFs में अपना आवंटन बढ़ाया होगा, जिससे कुल इनफ्लो में योगदान मिला।
लंबी अवधि के निवेशक का नजरिया
कीमतों में अस्थिरता के बावजूद, एक्सपर्ट्स का मानना है कि प्रीशियस मेटल्स (Precious metals) को पोर्टफोलियो में रखने का फंडामेंटल कारण अभी भी कई निवेशकों के लिए प्रासंगिक है। इक्विরাস ग्रुप (Equirus Group) के हेड ऑफ वेल्थ अमित बिवालकर (Amit Bivalkar) के अनुसार, सोना लगातार इन्फ्लेशन हेज (Inflation hedge) का काम करता है और पोर्टफोलियो को डाइवर्सिफाई (Diversify) करने का एक तरीका है, खासकर तब जब इक्विटी मार्केट का प्रदर्शन अस्थिर हो। कई लोगों के लिए, जून की कीमत गिरावट को एग्जिट (Exit) करने के बजाय कम स्तर पर यूनिट्स जमा करने का एक एंट्री पॉइंट (Entry point) माना गया।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
गोल्ड और सिल्वर ETFs को ट्रैक करने वाले निवेशकों को अमेरिकी आर्थिक संकेतकों पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए, विशेष रूप से अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) के ब्याज दर संबंधी फैसले और यूएस डॉलर इंडेक्स (US Dollar index) की चाल। चूंकि प्रीशियस मेटल्स की कीमत वैश्विक स्तर पर तय होती है, इसलिए डॉलर की मजबूती और बॉन्ड यील्ड्स (Bond yields) कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रमुख कारक बने रहेंगे। इसके अतिरिक्त, भू-राजनीतिक स्थिरता में कोई बड़ा बदलाव या घरेलू मांग पैटर्न में परिवर्तन आने वाले महीनों में इन ETFs के प्रदर्शन को प्रभावित करेगा।
