एक नई पॉलिसी रिपोर्ट में प्राइमरी एल्युमीनियम पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को खत्म करने की सिफारिश की गई है। इसका मकसद छोटे और मझोले उद्योगों (MSMEs) को बड़ी राहत देना है, ताकि कच्चे माल की ऊंची लागत को कम किया जा सके।
MSMEs की लागत कम करने पर जोर
पॉलिसी कंसेंसस सेंटर की एक नई रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया है कि प्राइमरी एल्युमीनियम पर लगने वाली बेसिक कस्टम ड्यूटी को धीरे-धीरे खत्म करके शून्य कर दिया जाए। इस कदम से उन छोटे और मझोले उद्योगों (MSMEs) को बड़ी राहत मिलेगी जो कच्चे माल के तौर पर प्राइमरी एल्युमीनियम पर निर्भर हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन निर्माताओं के लिए इनपुट लागत उत्पादन खर्च का लगभग 80% होती है, जो कि काफी ज्यादा है।
इंपोर्ट पैरिटी प्राइसिंग का मुद्दा
भारतीय एल्युमीनियम सेक्टर में इंपोर्ट पैरिटी प्राइसिंग (Import Parity Pricing) एक बड़ी समस्या है। इसके तहत, घरेलू उत्पादक भी अपने मेटल की कीमत में मौजूदा कस्टम ड्यूटी को जोड़कर कीमतें तय करते हैं। इसका मतलब है कि स्थानीय स्तर पर एल्युमीनियम खरीदने वाले MSMEs को भी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। रिसर्च में पाया गया है कि यह प्रैक्टिस डाउनस्ट्रीम कंपनियों के मुनाफे को कम कर रही है। इससे बड़े प्राइमरी प्रोड्यूसर्स के मुनाफे और रोजगार देने वाले छोटे डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।
डाउनस्ट्रीम MSMEs के सामने चुनौतियां
भारत प्राइमरी एल्युमीनियम का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसकी सालाना क्षमता 4.16 मिलियन टन से ज्यादा है। लेकिन, 10,000 से ज्यादा इकाइयों वाले डाउनस्ट्रीम सेक्टर को 'टैरिफ इन्वर्जन' (Tariff Inversion) जैसी संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसमें कच्चे माल (प्राइमरी एल्युमीनियम) पर ड्यूटी, तैयार माल पर लगने वाली ड्यूटी से ज्यादा होती है। ऐसे में भारतीय निर्माताओं के लिए मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है, खासकर जब ASEAN, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के जरिए तैयार उत्पाद कम या जीरो ड्यूटी पर देश में आ जाते हैं।
कॉम्पिटिटिवनेस के लिए रणनीतिक बदलाव
रिपोर्ट का सुझाव है कि सिर्फ ड्यूटी हटाना काफी नहीं होगा। इसके साथ प्राइमरी प्रोड्यूसर्स को एनर्जी कॉस्ट के लिए टारगेटेड सपोर्ट देने की भी बात कही गई है। शोधकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि इंपोर्ट रूल्स को सख्त किया जाए और बाहरी देशों से आने वाले सस्ते माल के खिलाफ बेहतर सुरक्षा उपाय किए जाएं। इसका मकसद घरेलू वैल्यू एडिशन को बढ़ाना और 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा देना है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
इन ड्यूटीज को तर्कसंगत बनाने का कदम निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर सरकार इन सिफारिशों को मानती है, तो प्राइमरी एल्युमीनियम उत्पादकों की प्राइसिंग पावर और मुनाफे पर असर पड़ सकता है। वहीं, दूसरी तरफ, सेकेंडरी एल्युमीनियम सेक्टर की मैन्युफैक्चरिंग कॉम्पिटिटिवनेस में बड़ा उछाल आ सकता है। यह सेक्टर पावर ट्रांसमिशन, रेलवे, इलेक्ट्रिक व्हीकल और कंस्ट्रक्शन जैसे उद्योगों के लिए जरूरी कंपोनेंट्स सप्लाई करता है। सरकार बड़े उत्पादकों और छोटे डाउनस्ट्रीम वैल्यू-एडर्स के हितों में कैसे संतुलन बनाती है, यह देखना अहम होगा।
