ग्लोबल मार्केट में प्लैटिनम की कीमतें **$2,500** प्रति औंस के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे आ गई हैं। ऑटो सेक्टर में सुस्ती और बढ़ती बॉन्ड यील्ड के कारण कीमती धातुओं पर दबाव बढ़ गया है।
ऑटो सेक्टर की सुस्ती बनी मुख्य कारण
प्लैटिनम का सबसे बड़ा इस्तेमाल ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में कैटेलिटिक कन्वर्टर्स (catalytic converters) बनाने में होता है, जो गाड़ियों के एमिशन को कम करते हैं। जैसे ही ग्लोबल कार सेल्स में सुस्ती आती है, प्लैटिनम की डिमांड तुरंत प्रभावित होती है। मौजूदा गिरावट का मुख्य कारण ग्लोबल लेवल पर गाड़ियों के प्रोडक्शन में आई कमी है, जिसके चलते बाजार में सरप्लस सप्लाई (supply surplus) का डर पैदा हो गया है।
मैक्रोइकॉनॉमिक प्रेशर और बॉन्ड यील्ड
बढ़ती ग्लोबल बॉन्ड यील्ड ने भी प्लैटिनम पर भारी दबाव डाला है। जब सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दरें ज्यादा होती हैं, तो निवेशक प्लैटिनम जैसी कमोडिटी से पैसा निकालकर सुरक्षित बॉन्ड में लगाना पसंद करते हैं। चूंकि प्लैटिनम पर कोई फिक्स्ड इंटरेस्ट नहीं मिलता, इसलिए यह निवेशकों के लिए कम आकर्षक हो गया है। साथ ही, ईरान (Iran) के साथ चल रहे भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tension) के बावजूद निवेशक सेफ हेवन में रुकने के बजाय मुनाफे की बुकिंग (profit booking) करना बेहतर समझ रहे हैं।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत के लिए यह खबर मिली-जुली है। चूंकि भारत अपनी प्लैटिनम की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात (import) करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट से गहना निर्माण और औद्योगिक क्षेत्र की लागत कम हो सकती है। हालांकि, यह गिरावट ग्लोबल इकोनॉमी में सुस्ती का संकेत भी है, जो भारत के एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर के लिए चिंता की बात हो सकती है। निवेशकों को आने वाले दिनों में ग्लोबल ऑटो सेल्स डेटा और केंद्रीय बैंकों के फैसलों पर नजर रखनी चाहिए।
