भारतीय कॉफी और रबर निर्यातकों के सामने अब यूरोपियन यूनियन के नए सख्त नियम आ गए हैं, जिससे एक्सपोर्ट मार्केट पर खतरा मंडरा रहा है। वहीं, घरेलू चाय उत्पादकों पर आयात में **50.6%** की भारी उछाल का दबाव बढ़ा है।
भारत का प्लांटेशन सेक्टर इन दिनों दो बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है, जिसका सीधा असर कॉफी, रबर और चाय कंपनियों के भविष्य के मुनाफे पर पड़ सकता है। 'यूनाइटेड प्लांटर्स एसोसिएशन ऑफ साउदर्न इंडिया' (UPASI) की 133वीं सालाना कॉन्फ्रेंस में इंडस्ट्री लीडर्स ने इन ऑपरेश्नल रिस्क पर विस्तार से चर्चा की।
EUDR का दबाव और एक्सपोर्ट का संकट
यूरोपियन यूनियन ने 'यूरोपियन यूनियन डिफॉरेस्टेशन रेगुलेशन' (EUDR) लागू किया है। इसके तहत निर्यातकों को यह साबित करना होगा कि उनकी कॉफी और रबर ऐसी जमीन पर नहीं उगाई गई है, जहाँ पेड़ों की कटाई हुई है। समस्या यह है कि भारत में ज्यादातर छोटे किसान हैं, जिनके पास अपने लैंडहोल्डिंग्स का सटीक डिजिटल डेटा या जियोलोकेशन रिकॉर्ड नहीं है। अगर समय रहते सरकार या इंडस्ट्री कोई ठोस समाधान नहीं निकालती, तो इन छोटे किसानों का यूरोप के बड़े मार्केट से बाहर होना तय है।
चाय इंडस्ट्री: मार्जिन पर दबाव
दूसरी तरफ, चाय कंपनियों का हाल भी कुछ खास नहीं है। साल 2026 की पहली छमाही के आधिकारिक डेटा के मुताबिक, देश में चाय का आयात 50.6% बढ़कर करीब 1.50 करोड़ किलोग्राम तक पहुंच गया है। सस्ते विदेशी चाय के आने से घरेलू नीलामी केंद्रों (Auctions) पर कीमतें गिर रही हैं। लेबर और फर्टिलाइजर की बढ़ती लागत के बीच यह सस्ता आयात कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को बुरी तरह निचोड़ रहा है।
निवेशकों के लिए नजरिया
निवेशकों को उन कंपनियों पर खास नजर रखनी होगी जिनका यूरोप में बड़ा एक्सपोर्ट एक्सपोजर है, क्योंकि अनुपालन (Compliance) के लिए डिजिटल सप्लाई चेन बनाने में उनकी लागत बढ़ेगी। वहीं, चाय कंपनियों के लिए मुख्य रिस्क 'मार्जिन कंप्रेशन' का है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार चाय की कीमतों को कंट्रोल करने के लिए क्वालिटी चेक या ड्यूटी में बदलाव जैसे कदम उठाती है या नहीं।
