बाज़ार में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जहां एक तरफ कच्चे तेल की कीमतों में भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension) के कारण जबरदस्त उछाल आया, वहीं दूसरी तरफ डॉलर की मजबूती और महंगाई की चिंताओं ने सोने को नीचे धकेल दिया।
कच्चे तेल में हाहाकार, होर्मुज पर सप्लाई संकट:
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी अमेरिका-ईरान तनाव ने वैश्विक तेल बाज़ार को हिला कर रख दिया है। इस महत्वपूर्ण शिपिंग रूट पर ट्रैफिक लगभग ठप हो गया है, जिसे इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने 'ऊर्जा सप्लाई के इतिहास का सबसे बड़ा झटका' बताया है। इस संकट के चलते ब्रेंट क्रूड (Brent crude) फ्यूचर 17% की साप्ताहिक बढ़त के साथ $107.49 प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) $96.17 पर ट्रेड कर रहा था। यह ब्रेंट के लिए 13% की शानदार साप्ताहिक बढ़त थी।
गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने इस सप्लाई शॉक को देखते हुए 2026 की चौथी तिमाही (Q4 2026) के लिए अपने कच्चे तेल के अनुमानों को ऊपर की ओर संशोधित किया है, जिसमें ब्रेंट $90 और WTI $83 प्रति बैरल रहने की उम्मीद है। Macquarie और Nuvama जैसे विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि यह रुकावट लंबे समय तक बनी रही, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें $150 प्रति बैरल तक भी पहुँच सकती हैं। इस समय बाज़ार की पूरी नज़र फिजिकल सप्लाई (Physical Supply) की कमी पर है।
सोने की चमक फीकी, डॉलर बना मज़बूत:
एक ओर जहां कच्चे तेल में आग लगी थी, वहीं सोने (Gold) की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। स्पॉट गोल्ड 0.3% की नरमी के साथ लगभग $4,694 प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था, जबकि इसने जनवरी 2026 में $5,600 का ऑल-टाइम हाई छुआ था। सोने की इस गिरावट का मुख्य कारण अमेरिकी डॉलर (U.S. Dollar) का मज़बूत होना है, जिसे मध्य पूर्व में शांति बहाली की उम्मीदों के धूमिल पड़ने से सहारा मिला।
लगातार बढ़ती महंगाई (Inflation) की चिंताएं और ऊंची ब्याज दरों (Interest Rates) के लंबे समय तक बने रहने की आशंकाएं भी सोने के लिए बड़ी रुकावट बन रही हैं। मार्च 2026 में सोने ने इन चिंताओं के चलते लगभग 10% की बड़ी मासिक गिरावट भी झेली थी। हालांकि, J.P. Morgan और Wells Fargo जैसे बड़े संस्थान 2026 के अंत तक सोने की कीमतों के $5,400 से $6,300 तक जाने का अनुमान लगा रहे हैं, और मौजूदा गिरावट को लंबी अवधि के तेज़ी वाले ट्रेंड (Bullish Trend) में एक कंसॉलिडेशन (Consolidation) करार दे रहे हैं।
बाज़ार का मिजाज और आगे की राह:
यह उलटफेर दर्शाता है कि कच्चा तेल तत्काल सप्लाई शॉक पर प्रतिक्रिया दे रहा है, जबकि सोना व्यापक वित्तीय रुझानों से ज़्यादा प्रभावित है। अमेरिकी डॉलर को शांति वार्ता की घटती संभावनाओं और महंगाई के दबाव से बल मिला है, जिससे 'हायर फॉर लॉगर' (Higher for Longer) ब्याज दर के परिदृश्य का संकेत मिलता है।
उच्च तेल कीमतों की स्थिरता भू-राजनीतिक सफलताओं पर निर्भर करती है, जो जोखिम प्रीमियम को तुरंत हटा सकती हैं। साथ ही, यदि महंगाई केंद्रीय बैंकों को सख्ती जारी रखने पर मजबूर करती है, तो मंदी (Recession) का खतरा बढ़ सकता है, जो ऊर्जा की मांग को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा। सोने के लिए, मज़बूत डॉलर एक बड़ी चुनौती है। यदि महंगाई उम्मीद से ज़्यादा ज़िद्दी साबित होती है, तो डॉलर और मज़बूत हो सकता है। Goldman Sachs को उम्मीद है कि 2025 में सरप्लस (Surplus) से 2026 की दूसरी तिमाही (Q2 2026) तक वैश्विक तेल बाज़ार में बड़ी कमी (Deficit) आ सकती है। वहीं, सोने के विश्लेषक मध्यम अवधि के लिए आशावादी बने हुए हैं।
