सप्लाई में भारी कमी और डिमांड का गिरना
IEA ने कच्चे तेल की सप्लाई में इस साल 15 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) की बड़ी कटौती का अनुमान लगाया है। यह पहले के अनुमानों के ठीक उलट है, जहाँ सप्लाई बढ़ने की उम्मीद थी। एजेंसी ने इसे 'इतिहास की सबसे बड़ी ऑयल सप्लाई रुकावट' करार दिया है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ (Strait of Hormuz) जैसे अहम रूट पर ब्लॉक और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों ने एक्सपोर्ट को बुरी तरह प्रभावित किया है। यह रूट दुनिया के करीब 20% ऑयल सप्लाई संभालता है, और अब यहाँ से होने वाली सप्लाई लगभग न के बराबर रह गई है। खाड़ी देशों ने अकेले प्रोडक्शन में 1 करोड़ बैरल प्रतिदिन से ज्यादा की कटौती की है, और मार्च तक इसमें 80 लाख बैरल और कमी आने का अनुमान है। इस कमी को पूरा करने के लिए, IEA सदस्य देश इमरजेंसी रिजर्व से 40 करोड़ बैरल तेल निकालने जा रहे हैं, जो अब तक का सबसे बड़ा कोऑर्डिनेटेड कदम है।
डिमांड में गिरावट का अनुमान और आर्थिक खतरे
सप्लाई में इस भारी कमी के चलते अब ग्लोबल ऑयल डिमांड में भी गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा है। IEA का नया अनुमान है कि 2026 तक ऑयल डिमांड 80,000 बैरल प्रतिदिन घट सकती है। यह पहले के 6,40,000 बैरल प्रतिदिन की ग्रोथ के अनुमान से बिल्कुल अलग है। मिडिल ईस्ट और एशिया-पैसिफिक जैसे क्षेत्र पहले ही सबसे ज्यादा डिमांड में गिरावट देख रहे हैं।
ऐतिहासिक रूप से, तेल सप्लाई में ऐसे झटकों का असर अर्थव्यवस्थाओं पर मंदी के रूप में देखा गया है। 1973 के तेल संकट या 1990 में कुवैत पर हमले के बाद की मंदी को याद किया जा सकता है। लगातार ऊंची तेल कीमतें महंगाई (Inflation) बढ़ा सकती हैं, फाइनेंशियल कंडीशंस को टाइट कर सकती हैं और सेंट्रल बैंकों के लिए पॉलिसी बनाना मुश्किल बना सकती हैं। यूरोप (Europe) और जापान (Japan) जैसे देश इसमें सबसे ज्यादा एक्सपोज्ड दिख रहे हैं। अमेरिकी इकोनॉमी (US Economy) घरेलू प्रोडक्शन के कारण थोड़ी सुरक्षित है, लेकिन लंबे समय तक डिस्टर्बेंस GDP और कंज्यूमर स्पेंडिंग को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) का खतरा बढ़ रहा है, यानी महंगाई के साथ ग्रोथ का रुकना।
लंबी अवधि की अनिश्चितता और इंडस्ट्री के फैसले
हालांकि, लंबी अवधि में 2026 तक कुछ देशों जैसे अमेरिका, कनाडा, ब्राजील से बढ़ी हुई प्रोडक्शन के चलते सप्लाई सरप्लस की भी उम्मीद है, जो कीमतों पर एक कैप लगा सकता है। लेकिन बढ़ती जियोपॉलिटिकल टेंशन और लंबे समय तक चलने वाले टकराव का खतरा इकोनॉमी के लिए बड़ी मुसीबतें खड़ी कर सकता है। मार्केट पहले से ही भविष्य की सप्लाई रुकावटों को कीमतों में शामिल कर रहा है, जिससे अनिश्चितता बनी हुई है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ जैसे अहम ट्रेड रूट्स का इस्तेमाल करना एक बड़ी चिंता का विषय है, जिसके ग्लोबल कॉन्सिक्वेंस (Consequences) एनर्जी से कहीं आगे तक जाते हैं।
इस स्थिति में, प्रमुख ऑयल कंपनियों के अपने स्ट्रैटेजी हैं। Saudi Aramco लो प्रोडक्शन कॉस्ट पर फोकस कर रही है, जबकि वेस्टर्न कंपनियां (Western Companies) जैसे ExxonMobil और Shell अपने प्रॉफिटेबल एसेट्स (Assets) और LNG मार्केट पर ध्यान दे रही हैं। अमेरिका खुद एक बड़ा प्रोड्यूसर है। यह संकट सरकारों को एनर्जी सिक्योरिटी के लिए रिन्यूएबल्स (Renewables) की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकता है, या फिर शॉर्ट टर्म में फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता बढ़ा सकता है।