बुधवार को भारतीय शेयर बाज़ार में एनर्जी सेक्टर में साफ बंटवारा देखने को मिला। कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतों के चलते ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के शेयरों में **4%** तक की गिरावट आई, जबकि अपस्ट्रीम प्रोड्यूसर्स जैसे ONGC और Oil India के शेयरों में **2%** की तेज़ी दर्ज की गई।
OMCs पर महंगाई का डबल अटैक
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें $75.54 प्रति बैरल को पार कर गईं, जिसका मुख्य कारण अमेरिका द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई और प्रतिबंधों का लगना रहा। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के लिए, कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतें सीधा लागत (Cost) बढ़ाती हैं। चूँकि ये कंपनियाँ बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पातीं, इनके प्रॉफिट मार्जिन पर भारी दबाव आता है। इसी वजह से इन कंपनियों के शेयरों में पिछले कुछ समय में 15% से ज़्यादा की गिरावट आई है, जबकि BSE Sensex में इसी दौरान 8.9% की गिरावट दर्ज हुई है।
अपस्ट्रीम प्रोड्यूसर्स की चांदी
OMCs के विपरीत, ONGC और Oil India जैसी अपस्ट्रीम कंपनियाँ तेल की बढ़ी कीमतों से सीधे तौर पर फ़ायदा उठाती हैं। ये कंपनियाँ तेल और गैस का उत्पादन करती हैं, इसलिए इनकी कमाई सीधे तेल की बाज़ार कीमत से जुड़ी होती है। जैसे-जैसे ब्रेंट क्रूड की कीमतें बढ़ीं, बाज़ार ने इन प्रोड्यूसर्स को सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। साल-दर-साल (Year-to-date) इनके शेयरों में 4% तक का उछाल देखा गया है, जो बाज़ार के सामान्य ट्रेंड के विपरीत है।
आगे क्या?
रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, लगातार ऊँचे तेल दामों से OMCs की वर्किंग कैपिटल की ज़रूरतें बढ़ सकती हैं। जब अंडर-रिकवरीज़ (यानी ईंधन की लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर) बढ़ती है, तो इन कंपनियों को शॉर्ट-टर्म डेट (Short-term Debt) बढ़ाने की ज़रूरत पड़ सकती है, जो उनकी वित्तीय सेहत को और कमज़ोर कर सकता है। इतिहास गवाह है कि सरकारें अस्थिरता के समय में रिटेल फ्यूल प्राइसेस (Retail Fuel Prices) को प्रभावित करती रही हैं, जो रिफाइनर्स के मार्जिन के लिए एक अतिरिक्त चिंता का विषय है।
निवेशकों को इन कंपनियों के आने वाले क्वार्टरली रिजल्ट्स (Quarterly Results) पर नज़र रखनी चाहिए ताकि मार्जिन और डेट लेवल पर असली असर का पता चल सके। इसके अलावा, सरकार द्वारा फ्यूल एक्साइज ड्यूटी (Fuel Excise Duty) या सब्सिडी (Subsidy) नीतियों में कोई भी बदलाव आने वाले महीनों में मार्केटिंग कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी के लिए अहम साबित होगा।
