ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य हमलों ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में शिपिंग को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसके कारण कच्चे तेल की कीमतें **$86** प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। इस महत्वपूर्ण ऊर्जा कॉरिडोर से जहाजों की आवाजाही घटने से सप्लाई चेन को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
ऊर्जा सप्लाई पर बढ़ा दबाव
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर दबाव आ गया है। एक अंतरिम युद्धविराम के टूटने के बाद दोनों देशों के बीच शनिवार को फिर से हमले हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के होर्मुजगन प्रांत में बिजली और डिसेलिनेशन प्लांट को भी नुकसान पहुंचा है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग पर असर
दुनिया के एक बड़े हिस्से का तेल सप्लाई इसी हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। फरवरी के अंत से ही ईरान ने जहाजों की आवाजाही पर सख्त नियंत्रण लगा दिया है। लेटेस्ट डेटा के अनुसार, पिछले गुरुवार तक इस कॉरिडोर से रोजाना गुजरने वाले जहाजों की संख्या घटकर औसतन सिर्फ 8 रह गई थी। सप्लाई रूट में इस रुकावट के कारण ही तेल की कीमतें पिछले एक महीने में पहली बार $86 प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई हैं।
क्षेत्रीय तनाव और सप्लाई का खतरा
इस संघर्ष का असर आसपास के देशों पर भी दिख रहा है। कुवैत, इराक और जॉर्डन जैसे देशों के एयर डिफेंस सिस्टम ड्रोन और मिसाइलों को रोकने में लगे हैं। ऊर्जा बाजारों के लिए खतरा सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर को हुए नुकसान से कहीं ज्यादा है। अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकेबंदी (naval blockade) को फिर से शुरू कर दिया है, जिसका मकसद कच्चे तेल के निर्यात को रोकना है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में कमी और नौसैनिक नाकेबंदी, ये दोनों ही वैश्विक तेल सप्लाई पर दबाव बना रहे हैं।
आर्थिक और राजनीतिक अनिश्चितता
निवेशक इस स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। अमेरिका पर इस संघर्ष को संभालने और किसी भी तरह की बड़ी उलझन से बचने का दबाव है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हुई पिछली कूटनीतिक बातचीत भी ठप पड़ गई है। ऐसे में, ईरान की गतिविधियों को प्रभावित करने के लिए परिवहन इंफ्रास्ट्रक्चर और पावर ग्रिड को निशाना बनाया जा रहा है। यह स्थिति काफी अस्थिर है और शिपिंग में लंबे समय तक रुकावट का खतरा बना हुआ है।
बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से कितने तेल टैंकर सफलतापूर्वक गुजर पाते हैं और नौसैनिक नाकेबंदी को लेकर कोई नई घोषणा होती है या नहीं। अगर शिपिंग प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहे या क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और भी ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इससे ऊर्जा आयात करने वाले देशों और उनसे जुड़े उद्योगों पर असर पड़ेगा। बाजार यह भी देख रहा है कि क्या वैश्विक भंडार (global reserves) या वैकल्पिक सप्लाई रूट इन दिक्कतों से निपटने में मदद कर सकते हैं।
