सऊदी अरब की एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों के बाद Brent Crude का भाव **$103** के पार पहुंच गया है, जिससे भारत के लिए इंडियन बास्केट **$127** हो गई है। इसका सीधा असर सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर पड़ रहा है, जिन्हें रोजाना **₹530 करोड़** का नुकसान झेलना पड़ रहा है।
सऊदी अरब के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और रियाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हूती विद्रोहियों के हालिया हमलों ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट में हलचल मचा दी है। इन हमलों के कारण Brent Crude के दाम $103 प्रति बैरल के स्तर को पार कर गए हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। हालांकि रूस-यूक्रेन क्षेत्र से सप्लाई को लेकर कुछ राहत भरी खबरें भी हैं, लेकिन फिलहाल वेस्ट एशिया में चल रहा तनाव ही कीमतों का सबसे बड़ा ड्राइवर बना हुआ है।
ऑयल कंपनियों पर वित्तीय दबाव
भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल आयात करता है। ग्लोबल कीमतों में तेजी के कारण 'इंडियन बास्केट' का दाम $127 प्रति बैरल तक पहुंच गया है। इसका सीधा असर सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर पड़ रहा है। अक्टूबर 2026 तक की स्थिति के अनुसार, इन कंपनियों को रोजाना ₹530 करोड़ की अंडर-रिकवरी (नुकसान) हो रही है। जब कंपनियां लागत से कम दाम पर ईंधन बेचती हैं, तो यह सीधे उनके मुनाफे और बैलेंस शीट को प्रभावित करता है, जिससे उनके डिविडेंड देने और निवेश करने की क्षमता पर भी असर पड़ता है।
RBI का दखल
इस संकट को देखते हुए, Reserve Bank of India (RBI) ने 10 अक्टूबर 2026 को सरकारी ऑयल कंपनियों के लिए एक स्पेशल डॉलर-सप्लाई विंडो खोलने का ऐलान किया। इसका उद्देश्य रुपये की वैल्यू को अचानक गिरने से बचाना है। डॉलर की सीधी सप्लाई सुनिश्चित करके RBI मार्केट में रुपये पर पड़ रहे दबाव को कम करना चाहता है, ताकि ट्रेड डेफिसिट और करेंसी की अस्थिरता को मैनेज किया जा सके।
महंगाई का खतरा
भारत के लिए चिंता सिर्फ ऑयल कंपनियों का घाटा नहीं, बल्कि घरेलू महंगाई भी है। जब कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो लॉजिस्टिक और मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ जाती है, जिसका असर कंज्यूमर्स की जेब पर पड़ना तय है। निवेशकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि यह तनाव कितने समय तक चलता है और सरकार ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए आगे क्या नीति अपनाती है।
