क्रूड ऑयल $90 के पार! एशिया चमका, भारत में महंगाई और ट्रेड डेफिसिट का डर

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
क्रूड ऑयल $90 के पार! एशिया चमका, भारत में महंगाई और ट्रेड डेफिसिट का डर
Overview

Middle East में बढ़ते तनाव के कारण ग्लोबल ऑयल मार्केट में बड़ी हलचल देखी जा रही है। **WTI क्रूड ऑयल** **$90** प्रति बैरल के पार निकल गया है। इस वजह से एशियाई बाज़ार तो चमके, लेकिन भारत में शेयर बाज़ार (Stock Market) की शुरुआत सतर्क रहने की उम्मीद है। सोने की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी हुई, जबकि चांदी में मिला-जुला रुख रहा। शुक्रवार को विदेशी निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयरों (Indian Stocks) में खरीदारी की, लेकिन घरेलू निवेशकों (DIIs) ने भारी बिकवाली की।

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Middle East में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में भारी उछाल आया है। West Texas Intermediate (WTI) क्रूड फ्यूचर्स $90.05 प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि Brent क्रूड $96.93 पर बंद हुआ। दोनों में क्रमशः 7% और 6% से ज्यादा की तेजी देखी गई।

कच्चे तेल की यह रिकॉर्ड तेजी, जो कई उद्योगों के लिए एक बड़ी लागत है, ने तुरंत वैश्विक बाजारों को प्रभावित किया। हालांकि, एशियाई शेयर बाज़ारों (Asian Stock Markets) ने मजबूती दिखाई। जापान का Nikkei 225 और दक्षिण कोरिया का Kospi दोनों हरे निशान में कारोबार कर रहे थे। इसके विपरीत, अमेरिकी इक्विटी फ्यूचर्स (US Equity Futures) में गिरावट देखी गई, जो पश्चिमी बाजारों में अधिक सतर्कता का संकेत दे रहा था। भारत के GIFT Nifty इंडेक्स से भी एक अधिक शांत और सतर्क शुरुआत का संकेत मिला।

भारत, जो एक बड़ा ऊर्जा आयातक (Energy Importer) है, के लिए तेल की कीमतों में यह अस्थिरता (Volatility) संभावित महंगाई (Inflation) और व्यापार घाटे (Trade Balance) के लिए जोखिम बढ़ाती है।

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच, सोना (Gold) और चांदी (Silver) की कीमतों में मिला-जुला रुख देखा गया। भारत में 24-कैरेट सोने की कीमत में वृद्धि हुई, जो इसे एक पारंपरिक 'सेफ हेवन' (Safe Haven) एसेट बनाती है। हालांकि, COMEX एक्सचेंज पर सोने की कीमतों में गिरावट आई। भारत में चांदी की कीमतों में भी इजाफा हुआ, लेकिन COMEX चांदी फ्यूचर्स (COMEX Silver Futures) में गिरावट देखी गई, जो वैश्विक बाजारों में सट्टा दबाव (Speculative Pressure) की ओर इशारा करता है।

भारत में निवेश के प्रवाह (Investment Flows) की बात करें तो, शुक्रवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने ₹830.13 करोड़ के शेयर खरीदे। हालांकि, इस खरीदारी को घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) की ₹4,515.55 करोड़ की बिकवाली ने काफी पीछे छोड़ दिया। यह अंतर बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों (Geopolitical Risks) के बीच विदेशी और घरेलू संस्थानों की अलग-अलग रणनीतियों को उजागर करता है।

ऐतिहासिक रूप से, मध्य पूर्व (Middle East) के संघर्षों से प्रेरित तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत की अर्थव्यवस्था (Indian Economy) पर महत्वपूर्ण दबाव डाला है। भारत अपनी 85% से अधिक कच्चे तेल की ज़रूरतों को आयात (Import) करता है, जिससे वह बहुत संवेदनशील (Vulnerable) है। रिसर्च बताती है कि तेल की कीमतों में हर $10 की वृद्धि भारत के व्यापार घाटे को लगभग 0.36% तक बढ़ा सकती है और महंगाई को 0.35-0.40% तक बढ़ा सकती है।

एक सरकारी आर्थिक सलाहकार ने पहले कहा था कि $90 प्रति बैरल तक तेल की कीमतें अर्थव्यवस्था पर मामूली प्रभाव डालती हैं, लेकिन $130 से ऊपर कीमतें बने रहने पर यह आर्थिक विकास (Economic Growth) को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती हैं और महंगाई को काफी बढ़ा सकती हैं।

मार्च में भारत की वर्तमान महंगाई दर 3.4% थी, और केंद्रीय बैंक (Central Bank) का अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए महंगाई 4.6% रह सकती है।

भारतीय रुपया (Indian Rupee) भी दबाव में है, जो अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के मुकाबले लगभग 92.6 पर कारोबार कर रहा है। ऐसे संकटों के दौरान, तेल आयात के भुगतान के लिए डॉलर की बढ़ती मांग के कारण रुपया अक्सर कमजोर (Weakens) हो जाता है।

विश्लेषक (Analysts) चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष (Prolonged Conflict) उच्च ब्याज दरों (Higher Interest Rates) और अधिक बाजार अस्थिरता (Market Volatility) का कारण बन सकता है। यह स्थिति भारत की अर्थव्यवस्था के लिए स्पष्ट चिंता का कारण प्रस्तुत करती है। आयातित कच्चे तेल पर देश की भारी निर्भरता (Heavy Reliance) इसे आपूर्ति (Supply Issues) और मूल्य उतार-चढ़ाव (Price Swings) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। $90 प्रति बैरल से ऊपर तेल की कीमतों का बना रहना व्यापार घाटे को बढ़ा सकता है, भारतीय रुपये पर दबाव डाल सकता है, और आयातित महंगाई को हवा दे सकता है, जिससे भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरों का प्रबंधन करना कठिन हो जाएगा।

फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए, विकास 7.0-7.4% और महंगाई लगभग 2% अनुमानित थी। मार्च में, विदेशी निवेशकों ने बढ़ते जोखिम से बचने (Risk Aversion) के कारण भारी बिकवाली की, जो भू-राजनीतिक अशांति (Geopolitical Unrest) के दौरान उभरते बाजारों (Emerging Markets) में निवेश कम करने की वैश्विक प्रवृत्ति को दर्शाता है। यह कदम भारतीय बाजारों में निवेश के लिए कम पैसा उपलब्ध करा सकता है।

वस्तुओं (Commodities) की कीमतों और संस्थागत निवेश प्रवाह (Institutional Investment Flows) में अलग-अलग रुझान बताते हैं कि निवेशक केवल अल्पकालिक समाचारों पर प्रतिक्रिया करने के बजाय इन निरंतर जोखिमों को अपने निर्णयों में शामिल करना शुरू कर रहे हैं।

आगे देखते हुए, विश्लेषकों का दृष्टिकोण उभरते बाजारों (Emerging Markets) के लिए विभाजित है। कुछ लोग तनाव में संभावित कमी की उम्मीद करते हैं जिससे बाजार में उछाल आ सकता है। अन्य चेतावनी देते हैं कि भू-राजनीतिक जोखिम (Geopolitical Risks) ऊर्जा की कीमतों और महंगाई को लंबे समय तक उच्च रख सकते हैं। भारत के लिए, आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि मध्य पूर्व का संघर्ष कितने समय तक और कितना तीव्र रहता है, इसका कच्चे तेल की कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ता है, और इसके परिणामस्वरूप महंगाई और व्यापार घाटे पर क्या दबाव पड़ता है। बाजार निवेश प्रवाह (Investment Flows) और आर्थिक प्रभाव को प्रबंधित करने के लिए सरकार या भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा की गई किसी भी कार्रवाई पर बारीकी से नजर रखेंगे।

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