ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल की कीमतों में बुधवार को करीब **2%** की गिरावट दर्ज की गई है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर शुरू हुई नई कूटनीतिक बातचीत और अमेरिका में उम्मीद से ज्यादा **4.2 मिलियन** बैरल क्रूड इन्वेंट्री बढ़ने से कीमतों पर दबाव बढ़ा है। भारत के लिए यह राहत की खबर है, क्योंकि इससे इंपोर्ट बिल कम होगा और तेल कंपनियों के मार्जिन को सपोर्ट मिलेगा।
जियो-पॉलिटिकल तनाव में नरमी
26 अगस्त, 2026 को ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें गिरकर $86 प्रति बैरल के करीब आ गई हैं, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) फिसलकर $81 के स्तर पर ट्रेड कर रहा है। यह गिरावट ईरान और ओमान के बीच शुरू हुई नई कूटनीतिक बातचीत के बाद आई है, जो स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल की आवाजाही को सुरक्षित बनाने पर केंद्रित है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण शिपिंग मार्ग है। यहाँ तनाव कम होने से वैश्विक आपूर्ति बाधित होने का खतरा फिलहाल टल गया है, जिससे कीमतों में उछाल की आशंका कम हो गई है।
अमेरिका में इन्वेंट्री का दबाव
अमेरिकी पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट के आंकड़ों ने कीमतों को और नीचे धकेला है। 21 अगस्त को समाप्त हुए हफ्ते में अमेरिका की क्रूड इन्वेंट्री में 4.2 मिलियन बैरल की बढ़ोतरी हुई है, जो बाजार के 6 लाख बैरल के अनुमान से कहीं अधिक है। इन्वेंट्री में इतनी बड़ी उछाल कमजोर मांग या अधिक सप्लाई का संकेत देती है, जो कीमतों के लिए नकारात्मक है।
भारतीय अर्थव्यवस्था और कंपनियों पर असर
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है, इसलिए तेल की कीमतों में गिरावट का सीधा फायदा देश को मिलता है। इससे न केवल इंपोर्ट बिल कम होगा, बल्कि करंट अकाउंट डेफिसिट पर दबाव घटेगा और महंगाई को काबू करने में भी मदद मिलेगी।
इसका सीधा असर घरेलू ऑयल मार्केटिंग कंपनियों जैसे IOCL, BPCL और HPCL पर पड़ता है। कच्चे तेल के दाम कम होने से इन कंपनियों के मार्जिन में सुधार की संभावना है, जो लंबे समय से हाई इनपुट कॉस्ट से जूझ रहे थे।
आगे का रास्ता
निवेशकों को अभी सतर्क रहने की जरूरत है। जियो-पॉलिटिकल स्थिति अनिश्चित है और ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों की सख्ती भी एक बड़ा फैक्टर है। किसी भी नकारात्मक खबर से ये कीमतें फिर से तेजी दिखा सकती हैं, इसलिए अमेरिकी सरकार के आधिकारिक डेटा पर नजर रखना जरूरी होगा।
