हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में नेविगेशन को लेकर ईरान और ओमान के बीच समझौते की खबरों से कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आई है। ब्रेंट क्रूड **$87.84** प्रति बैरल पर सेटल हुआ है, हालांकि रूस-यूक्रेन संकट अभी भी बाजार के लिए बड़ा रिस्क बना हुआ है।
बाजार को मिली राहत
27 अगस्त, 2026 को ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड $87.84 प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) करीब $82.23 प्रति बैरल पर रहा। इस गिरावट की मुख्य वजह हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान और ओमान के बीच एक संभावित रेवेन्यू-शेयरिंग एग्रीमेंट की खबरें हैं, जिससे सप्लाई चेन में सुधार की उम्मीद जगी है।
हॉर्मुज फैक्टर और अनिश्चितता
हालांकि, ये राहत फिलहाल अस्थायी लग रही है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने स्पष्ट किया है कि जलमार्ग की स्थिति अमेरिका द्वारा शर्तों को मानने पर निर्भर करती है। इससे मार्केट में 'Wait-and-see' वाली स्थिति बनी हुई है, जहाँ हर नई कूटनीतिक खबर का असर कीमतों पर सीधा दिख रहा है।
रूस-यूक्रेन संकट का साया
कीमतों में गिरावट के बावजूद, भू-राजनीतिक जोखिम कम नहीं हुए हैं। यूक्रेन द्वारा अफिप्सकी ऑयल रिफाइनरी (Afipsky Oil Refinery) पर हालिया हमले ने ऊर्जा बुनियादी ढांचे की असुरक्षा को उजागर किया है। साथ ही, 24 अगस्त, 2026 को राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा जारी डिक्री, जिसमें सरकार को क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर अस्थायी नियंत्रण लेने का अधिकार दिया गया है, यह दर्शाता है कि सप्लाई-साइड का दबाव अभी भी बरकरार है।
भारतीय निवेशकों पर क्या होगा असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है, इसलिए क्रूड की कीमतों में उतार-चढ़ाव हमारे लिए सीधे तौर पर मायने रखता है। यदि तेल के दाम घटते हैं, तो यह भारत के आयात बिल को कम करने और रुपये को सपोर्ट देने में मदद करेगा। लेकिन अगर तनाव बढ़ा और कीमतें उछलीं, तो यह महंगाई बढ़ा सकता है और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के मार्जिन पर दबाव डाल सकता है।
