कच्चा तेल: ईरान-अमेरिका बातचीत से मिली राहत, पर क्यों अभी भी मंडरा रहा है खतरा?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
कच्चा तेल: ईरान-अमेरिका बातचीत से मिली राहत, पर क्यों अभी भी मंडरा रहा है खतरा?
Overview

आज यानी सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में नरमी देखी गई, जिसकी मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक मोर्चे पर आई सकारात्मक खबर है। इस खबर से तत्काल संघर्ष की आशंका कम हुई, जिससे Brent क्रूड **0.72%** गिरकर **$67.56** प्रति बैरल और WTI क्रूड **0.66%** फिसलकर **$63.13** प्रति बैरल पर आ गया।

कूटनीतिक हलचल से कीमतों में गिरावट

सोमवार की शुरुआत में कच्चे तेल के बेंचमार्क में मामूली गिरावट दर्ज की गई। अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत के रास्ते खुलते दिखे, जिससे क्षेत्रीय संघर्ष की आशंकाएं कम हुईं, जो कि ऊर्जा आपूर्ति के लिए खतरा बन सकती थीं। Brent क्रूड फ्यूचर्स 0.72% लुढ़ककर $67.56 प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 0.66% की गिरावट के साथ $63.13 पर कारोबार कर रहा था। ओमान में हुई अप्रत्यक्ष परमाणु वार्ता को ईरानी अधिकारियों ने "अच्छी शुरुआत" बताया है और आगे की चर्चाओं की योजना है। इस कूटनीतिक जुड़ाव के कारण कीमतों में शामिल भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम में कमी आई है।

हालांकि, यह राहत अस्थायी हो सकती है क्योंकि क्षेत्र में तनाव अभी भी बना हुआ है। ईरान के विदेश मंत्री ने हमले की स्थिति में अमेरिकी ठिकानों पर हमला करने की धमकी दोहराई है। बाज़ार की नज़रें स्ट्रेट ऑफ Hormuz पर टिकी हैं, जहाँ से दुनिया भर के तेल व्यापार का लगभग 20-25% हिस्सा गुजरता है। किसी भी तरह की झड़प के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

सेंक्शन्स से बदल रहा ग्लोबल सप्लाई का नक्शा

अमेरिका-ईरान की बातचीत के अलावा, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध (Sanctions) और बदलती व्यापारिक रणनीतियां भी वैश्विक तेल बाज़ार को प्रभावित कर रही हैं। यूरोपीय आयोग द्वारा रूसी समुद्री कच्चे तेल के निर्यात का समर्थन करने वाली सेवाओं पर प्रस्तावित प्रतिबंध व्यापार मार्गों को प्रभावित कर रहा है। वहीं, भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश रूसी तेल से दूरी बना रहे हैं। रूस से भारत का आयात कम हुआ है, जबकि अमेरिका से आयात बढ़ा है। यह बदलाव रूसी बैरल को अमेरिकी या वेनेजुएला के क्रूड से बदलने की ओर इशारा कर सकता है, जिससे सप्लाई की गतिशीलता में फेरबदल हो रहा है। प्रतिबंधों के बावजूद, दिसंबर में रूसी उत्पादन में कुछ सुधार देखा गया।

बाज़ार में बना हुआ है अनिश्चितता का माहौल

हालांकि तत्काल भू-राजनीतिक डर कम हुआ है, लेकिन कई ऐसे कारक हैं जो कीमतों में अस्थिरता और संभावित वृद्धि का संकेत देते हैं। ईरान का यूरेनियम संवर्धन पर रुख और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य संपत्तियों की मौजूदगी तनाव बढ़ने के निरंतर खतरे को दर्शाती है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य कार्रवाई की स्थिति में तेल की कीमतें $80 प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं।

आपूर्ति (Supply) पक्ष की बात करें तो, अमेरिकी ऊर्जा फर्मों ने लगातार तीसरे हफ्ते तेल और गैस रिग्स की संख्या बढ़ाई है, जिससे तेल रिग काउंट 412 तक पहुंच गया है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) का अनुमान है कि 2026 में अमेरिका का कच्चा तेल उत्पादन थोड़ा कम होगा। EIA के अनुसार, 2026 में वैश्विक तेल उत्पादन मांग से अधिक रहने की उम्मीद है, जिससे इन्वेंट्री बढ़ेगी और कीमतें moderat होंगी। EIA का अनुमान है कि Brent औसतन $56 और WTI $52 प्रति बैरल रह सकता है। J.P. Morgan ने 2026 के लिए Brent का औसत दाम $58 प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया है।

कुल मिलाकर, 2026 में तेल बाज़ार में अधिशेष (Surplus) पहले के अनुमान से अधिक तेज रहने की संभावना है, जिसका मुख्य कारण उत्पादन का मांग से तेज गति से बढ़ना है। EIA के अनुसार, 2026 में वैश्विक आपूर्ति 2.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन बढ़ सकती है। हालांकि, यह अनुमान OPEC+ की नीतियों और किसी भी बड़ी सप्लाई बाधा पर निर्भर करेगा। वर्तमान में कीमतें नरम दिख रही हैं, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक सप्लाई डायनामिक्स में जटिलताओं के कारण तेल बाज़ार में किसी भी समय तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

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