अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट आई है। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) $71 प्रति बैरल के स्तर पर आ गया है, जो भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से पहले का स्तर है। वहीं, भारत ने अनिश्चित प्रतिबंधों और मौजूदा स्टॉक को देखते हुए ईरान से तत्काल कच्चे तेल की खरीद से परहेज करने का फैसला किया है।
क्यों गिरी तेल की कीमतें?
वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी देखी जा रही है। ब्रेंट क्रूड का दाम लगभग $71 प्रति बैरल पर आ गया है। हाल ही में यह $72 से $74 के दायरे में कारोबार कर रहा था। ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों में अस्थायी ढील के बाद, तेहरान एक बार फिर बाज़ार में लौटने की कोशिश कर रहा है। लेकिन, भारतीय रिफाइनरी कंपनियां फिलहाल एहतियात बरत रही हैं। उन्हें डर है कि प्रतिबंधों की अवधि खत्म होते ही ये फिर से लागू हो सकते हैं, इसलिए वे ईरान से तुरंत तेल खरीदने से बच रही हैं।
भारतीय तेल कंपनियों पर असर
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का भारतीय तेल कंपनियों पर सीधा असर पड़ता है। आमतौर पर, जब कच्चा माल सस्ता होता है, तो ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (Gross Refining Margins) में सुधार की उम्मीद रहती है। दूसरी ओर, ऑयल एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन कंपनियों के लिए यह अच्छी खबर नहीं है, क्योंकि उन्हें अपने उत्पाद के लिए कम दाम मिलते हैं। अगर यह कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो घरेलू रिफाइनरियों की लागत कम होगी, जो पहले से ही अस्थिर वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अपने इन्वेंटरी की लागत को संभालने की कोशिश कर रही हैं।
भारत की सप्लाई स्ट्रैटेजी
भारत के पास फिलहाल अगस्त के मध्य तक अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त कच्चे तेल का स्टॉक मौजूद है। इस वजह से तत्काल नई खरीद की जरूरत कम हो गई है। हाल के दिनों में, भारतीय रिफाइनरियों ने तेल खरीद के अपने स्रोतों में काफी विविधता लाई है। वे रूस से तेल का आयात बढ़ा रहे हैं, जो अब लगभग 2.3 से 2.4 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच गया है। इसके अलावा, अमेरिका से WTI मिडलैंड ऑयल (WTI Midland Oil) और एलपीजी (LPG) की खरीद भी बढ़ी है। साथ ही, नाइजीरिया, वेनेजुएला और ब्राजील से भी तेल आयात किया जा रहा है। इस विविध आयात पोर्टफोलियो का मकसद किसी एक क्षेत्र से आपूर्ति में झटके लगने की स्थिति में देश को सुरक्षित रखना है।
वैश्विक मांग में बदलाव
वैश्विक तेल की कीमतों में स्थिरता या गिरावट का एक और कारण चीन जैसे बड़े उपभोक्ता देशों में मांग का कम होना भी है। चीन में तेल की मांग लगभग एक-तिहाई तक गिर गई है। इसका कारण इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़ता चलन और सीमेंट व स्टील जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में मंदी है। महंगे वैश्विक कच्चे तेल को खरीदने के बजाय, चीन कथित तौर पर अपनी रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Reserves) का उपयोग कर रहा है, जिससे वैश्विक व्यापार प्रवाह प्रभावित हुआ है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह देखना है कि क्या तेल की ये कम कीमतें बनी रहती हैं। अगर ब्रेंट क्रूड इसी रेंज में रहता है, तो यह भारत के व्यापार संतुलन (Trade Balance) को बेहतर बनाने और डाउनस्ट्रीम रिफाइनर्स के मुनाफे का समर्थन करने में मदद कर सकता है। हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर अनिश्चितता वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए एक बड़ा जोखिम बनी हुई है। निवेशकों की नजरें इस बात पर होंगी कि प्रतिबंधों में यह छूट कितने समय तक जारी रहती है और क्या भारत वैश्विक ऊर्जा नीति में किसी भी बदलाव के जवाब में अपनी आयात रणनीति बदलता है।
