ग्लोबल सप्लाई में सुधार के संकेतों के चलते Brent crude की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। वहीं, डॉलर की मजबूती के बावजूद सोने का भाव **$4,140** प्रति औंस के करीब टिका हुआ है, जो भारतीय निवेशकों के लिए महंगाई के मोर्चे पर थोड़ी राहत की उम्मीद जगाता है।
कच्चे तेल में सुस्ती की वजह
6 अक्टूबर, 2026 को ग्लोबल कमोडिटी मार्केट में बड़ा बदलाव दिखा। सप्लाई चेन में सुधार और मिडिल ईस्ट से बेहतर एक्सपोर्ट वॉल्यूम के चलते Brent crude के दाम $100.28 प्रति बैरल पर आ गए हैं। वहीं, US West Texas Intermediate crude फिसलकर $89.33 के आसपास ट्रेड कर रहा है। G7 देशों द्वारा स्ट्रैटेजिक रिजर्व जारी करने से मार्केट में सप्लाई क्रंच का डर भी कम हुआ है।
सोने की चाल और डॉलर का दबाव
जहां एक तरफ तेल सस्ता हो रहा है, वहीं सोना $4,140 प्रति औंस के स्तर पर मजबूती से खड़ा है। डॉलर इंडेक्स में 0.1% की तेजी और यूरोप (खासकर फ्रांस) में राजनीतिक अनिश्चितता के कारण निवेशकों ने सुरक्षित निवेश के तौर पर डॉलर को चुना है। आमतौर पर डॉलर मजबूत होने पर सोने पर दबाव पड़ता है, लेकिन US Federal Reserve की ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता ने सोने को सहारा दिया है।
भारतीय निवेशकों के लिए असर
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतें सीधे देश के ट्रेड बैलेंस और महंगाई (Inflation) को प्रभावित करती हैं। यदि तेल के दाम नरम रहते हैं, तो इससे ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को मार्जिन बनाए रखने में मदद मिलेगी और आम जनता पर कीमतों का बोझ भी कम होगा।
रिस्क अभी भी बरकरार
बाजार के जानकारों का मानना है कि जिओ-पॉलिटिकल रिस्क अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा एनर्जी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमलों का खतरा अभी भी बना हुआ है। किसी भी अचानक तनाव से तेल की कीमतों में फिर से उछाल आ सकता है, इसलिए निवेशकों को ग्लोबल सेंटीमेंट्स और Fed की पॉलिसी पर कड़ी नजर रखनी चाहिए।
