भू-राजनीतिक दबाव और सप्लाई का खेल
| क्रूड ऑयल (Crude Oil) | मार्केट | भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) | सप्लाई सरप्लस (Supply Surplus) |
तेल बाजार में इस वक्त एक नाजुक संतुलन देखने को मिल रहा है। कीमतें स्थिर बनी हुई हैं क्योंकि ट्रेडर्स (Traders) अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के साथ-साथ यूक्रेन युद्ध जैसे भू-राजनीतिक मुद्दों पर पैनी नजर रख रहे हैं। इन सब वजहों से कच्चे तेल की कीमतों में $5 से $7 प्रति बैरल का 'रिस्क प्रीमियम' (Risk Premium) जुड़ा हुआ है। खासकर, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में किसी भी संभावित रुकावट का खतरा और रूस से तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंध कीमतें बढ़ा सकते हैं। हालांकि, बाजार की प्रतिक्रिया फिलहाल धीमी है, क्योंकि ट्रेडर्स का मानना है कि मौजूदा सप्लाई (Supply) इन झटकों को झेलने के लिए काफी है।
सप्लाई का बढ़ता अंबार
| IEA | 2026 | सप्लाई | डिमांड |
लेकिन इस भू-राजनीतिक गहमागहमी के नीचे एक बड़ी 'बेयरिश' (Bearish) कहानी चल रही है: यानी, ग्लोबल ऑयल सप्लाई में भारी बढ़ोतरी का अनुमान। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने 2026 तक तेल की डिमांड ग्रोथ (Demand Growth) को घटाकर 8,50,000 बैरल प्रति दिन कर दिया है। वहीं, सप्लाई में 24 लाख बैरल प्रति दिन की बढ़ोतरी का अनुमान है। इससे 2026 तक 37 लाख बैरल प्रति दिन का भारी सरप्लस (Surplus) पैदा हो सकता है। इस अनुमान के पीछे OPEC+ देशों की भूमिका अहम है, जो अप्रैल से उत्पादन बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। उनका मकसद मार्केट शेयर (Market Share) वापस पाना और गर्मियों की बढ़ी हुई मांग को पूरा करना हो सकता है। यह अमेरिका, ब्राजील और गुयाना जैसे गैर-OPEC+ देशों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा को भी दर्शाता है।
मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर और भविष्य की मांग
| US Dollar | Inflation | AI |
तेल बाजार पर बड़े इकोनॉमिक फैक्टर (Economic Factors) का भी असर पड़ रहा है। आमतौर पर, अमेरिकी डॉलर (US Dollar) की मजबूती तेल की कीमतों पर दबाव डालती है, क्योंकि गैर-डॉलर खरीदारों के लिए यह महंगा हो जाता है। हाल ही में महंगाई (Inflation) में नरमी आई है, लेकिन केंद्रीय बैंकों की नीतियां और आर्थिक विकास दर की चाल डिमांड के आउटलुक (Outlook) के लिए महत्वपूर्ण रहेगी। भविष्य में, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तेजी से बढ़ती टेक्नोलॉजी ग्लोबल इलेक्ट्रिसिटी डिमांड को बढ़ा सकती है, जिसका अप्रत्यक्ष असर तेल बाजारों पर पड़ सकता है।
कीमतों में गिरावट की उम्मीद
| 2026 | OPEC+ | US Shale |
इन सब भू-राजनीतिक जोखिमों के बावजूद, 2026 में तेल की कीमतों में गिरावट की उम्मीद का बुनियादी तर्क मजबूत है। IEA का सरप्लस का अनुमान, OPEC+ और गैर-OPEC+ देशों से उत्पादन में बढ़ोतरी की उम्मीदें, यह सब बताते हैं कि सप्लाई भरपूर रहने वाली है। बाजार की वो क्षमता, जो पुराने भू-राजनीतिक झटकों को झेले हुए है, यह दर्शाती है कि मौजूदा तनाव कीमतों में स्थायी उछाल नहीं ला पाएंगे। इसके अलावा, ग्लोबल इकोनॉमी में मंदी या डॉलर में बड़ी गिरावट डिमांड को और भी कमजोर कर सकती है, जिससे सप्लाई सरप्लस की स्थिति और गंभीर हो सकती है।
आगे क्या?
| OPEC+ Meeting | March 1 | April Output |
विश्लेषक उम्मीद कर रहे हैं कि तेल की कीमतें फिलहाल एक दायरे में बनी रहेंगी, क्योंकि विपरीत ताकतें अपना खेल खेलेंगी। एक तरफ भू-राजनीतिक घटनाएं और सप्लाई में संभावित रुकावटें कीमतों को सहारा देंगी, तो दूसरी तरफ स्ट्रक्चरल ओवरसप्लाई (Structural Oversupply) और डिमांड ग्रोथ के कमजोर अनुमान कीमतों को नीचे रखेंगे। 1 मार्च को OPEC+ की बैठक खास रहेगी, जहां अप्रैल के लिए उत्पादन रणनीति पर चर्चा होगी। यह देखना होगा कि कूटनीतिक घटनाक्रम, सप्लाई का सरप्लस और वैश्विक आर्थिक स्थितियां किस दिशा में कीमतों को ले जाती हैं।
