टेंशन और सरप्लस का 'खेल'
ग्लोबल ऑयल मार्केट में फिलहाल जो तस्वीर दिख रही है, वह विरोधाभासों से भरी है। एक तरफ जियोपॉलिटिकल टेंशन (जैसे ईरान और रूस के आसपास की गतिविधियां) कीमतों में एक 'रिस्क प्रीमियम' जोड़ रही हैं, जिससे ब्रेंट क्रूड $70 प्रति बैरल और WTI $65 के करीब पहुंच गया है। इतिहास गवाह है कि ऐसी भू-राजनीतिक घटनाएं कीमतें बढ़ाती आई हैं, जैसे 1990 के खाड़ी युद्ध में कीमतें 112% तक उछल गई थीं या 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध ने इन्हें $100 प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया था।
लेकिन, इस बार चीज़ें थोड़ी अलग हैं। हालिया घटनाओं पर बाज़ार की प्रतिक्रिया उतनी तीव्र या लंबे समय तक चलने वाली नहीं दिख रही। ऐसा इसलिए क्योंकि फंडामेंटल्स (मौलिक कारक) एक बड़ी 'ओवरसप्लाई' यानी अतिरिक्त सप्लाई की ओर इशारा कर रहे हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, 2025 में ग्लोबल ऑयल इन्वेंटरीज में 477 मिलियन बैरल की अभूतपूर्व बढ़ोतरी देखी गई, जो 2020 के बाद का सबसे बड़ा स्तर है। यह अतिरिक्त सप्लाई औसतन 2.7 मिलियन बैरल प्रति दिन (b/d) की दर से बढ़ रही है, और 2026 में इसके 3.1 मिलियन b/d तक पहुंचने का अनुमान है। यह बढ़ती सप्लाई, जियोपॉलिटिकल चिंताओं पर भारी पड़ रही है।
सप्लाई में 'बाढ़' और डिमांड में 'धीमी रफ़्तार'
ऑयल मार्केट में अतिरिक्त सप्लाई के कई कारण हैं। चीन अपनी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) क्षमता को काफी बढ़ा रहा है, जिसका लक्ष्य 1 बिलियन बैरल तक पहुंचना है। 2026 तक कम से कम 169 मिलियन बैरल और जोड़ने की योजना है। यह खरीद भी अतिरिक्त तेल को खपा रही है। इसके अलावा, OPEC+ देशों के बाहर भी प्रोडक्शन में तेज़ी आ रही है, खासकर ब्राजील, गुयाना और अर्जेंटीना जैसे देशों से। अमेरिका का क्रूड ऑयल प्रोडक्शन भी 2025 के रिकॉर्ड 13.6 मिलियन b/d के आसपास रहने का अनुमान है।
दूसरी ओर, ग्लोबल डिमांड ग्रोथ धीमी पड़ रही है। IEA ने 2026 के लिए ऑयल डिमांड ग्रोथ का अनुमान घटाकर 850,000 b/d कर दिया है। वहीं, सप्लाई में 2.4 मिलियन b/d की बढ़ोतरी का अनुमान है, जिससे 3.7 मिलियन b/d का बड़ा सरप्लस पैदा होने की आशंका है। चीन में भी डिमांड ग्रोथ 3% से कम रह गई है। इन सब वजहों से, US एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) का अनुमान है कि ब्रेंट क्रूड की कीमतें 2025 में औसतन $69/b से गिरकर 2026 में $58/b पर आ सकती हैं, और WTI $52/b तक गिर सकता है।
'स्ट्रैंडेड' बैरल और सैंक्शन का दांव
भले ही ईरान और रूस जैसे देशों पर लगे सैंक्शन (प्रतिबंध) के चलते उनके लाखों बैरल तेल बाज़ार से 'बाहर' दिख रहे हों, लेकिन ये असल में 'स्ट्रैंडेड' हैं, यानी लॉजिस्टिकल चुनौती हैं, न कि तत्काल कमी। अनुमान है कि 40 मिलियन बैरल से ज़्यादा रूसी तेल अभी भी बिना बिके जहाज़ों पर है। रूस का ऑयल एक्सपोर्ट रेवेन्यू कीमतों के बावजूद सैंक्शन के कारण दबाव में है; 2025 में टैक्स रेवेन्यू 24% गिर गया। नए अमेरिकी सैंक्शन और EU के प्रतिबंध रूसी तेल के व्यापार को और मुश्किल बना सकते हैं, जिससे ज़्यादातर सप्लाई 'शैडो फ्लीट' यानी अप्रत्यक्ष तरीकों से बाज़ार में आएगी।
ईरान का ऑयल एक्सपोर्ट भी जनवरी 2026 तक 26% घटकर 1.39 मिलियन b/d से नीचे आ गया, और बिना बिका कच्चा तेल टैंकरों में जमा हो रहा है। ईरानी क्रूड पर डिस्काउंट भी बढ़ा है। समस्या यह है कि ये डिस्काउंटेड बैरल अंततः चीन जैसे बाज़ारों में अपनी जगह बना लेते हैं, जिससे वैश्विक सरप्लस और बढ़ता है। ऐसे में, अगर जियोपॉलिटिकल टेंशन कम होती हैं, तो यह प्रीमियम गायब हो जाएगा और बाज़ार अपनी मूल ओवरसप्लाई की हकीकत से रूबरू होगा।
भविष्य का अनुमान: सरप्लस से कीमतें 'सीमित'
कुल मिलाकर, प्रमुख एनर्जी एजेंसियों का अनुमान है कि 2026 तक ऑयल मार्केट में अच्छी-खासी सप्लाई बनी रहेगी। EIA का अनुमान है कि 2026 में ग्लोबल ऑयल इन्वेंटरी बिल्ड औसतन 3.1 मिलियन b/d रहेगा, जिससे कीमतें गिरेंगी। ब्रेंट $58/b और WTI $52/b पर रह सकता है। IEA भी 3.7 मिलियन b/d से ज़्यादा सरप्लस का अनुमान लगा रहा है। OPEC+ भले ही सप्लाई मैनेज करने की कोशिश कर रहा है और प्रोडक्शन रोकने के फैसले बढ़ा रहा है, लेकिन नॉन-OPEC+ की बढ़ती आउटपुट और चीन की डिमांड इसके प्रभाव को चुनौती दे सकती है। जियोपॉलिटिकल घटनाएं शॉर्ट-टर्म वोलेटिलिटी (उतार-चढ़ाव) पैदा कर सकती हैं, लेकिन स्ट्रक्चरल ओवरसप्लाई (संरचनात्मक अतिरिक्त सप्लाई) की वजह से कीमतों में बड़े उछाल की संभावना सीमित दिख रही है।