OPEC की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2027 तक ग्लोबल ऑयल खपत **108.2 मिलियन बैरल** प्रतिदिन हो जाएगी। इस तेजी में भारत और एशियाई बाजारों की भूमिका सबसे बड़ी रहने वाली है, जो भारतीय एनर्जी कंपनियों के लिए एक तरफ अवसर, तो दूसरी तरफ क्रूड इम्पोर्ट बिल का जोखिम भी बढ़ा रही है।
डिमांड बढ़ने के पीछे की असली वजह
तेजी से बढ़ती इकोनॉमी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उछाल के कारण भारत में ईंधन की मांग बढ़ रही है। ओपेक (OPEC) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत जैसे उभरते एशियाई बाजार विकसित देशों को पीछे छोड़ रहे हैं। भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) जैसे Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum के लिए यह वॉल्यूम ग्रोथ का संकेत है, क्योंकि फ्यूल की खपत बढ़ने से इनका डिस्ट्रीब्यूशन बिजनेस मजबूत होता है।
बड़ा रिस्क: क्रूड इंपोर्ट बिल
हालांकि, यह सिक्का का एक ही पहलू है। भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। मांग बढ़ने से यदि ग्लोबल बाजार में कीमतों में उछाल आता है, तो इससे भारत का इम्पोर्ट बिल सीधे तौर पर प्रभावित होगा, जो देश के करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) पर दबाव बना सकता है।
अपस्ट्रीम कंपनियों का खेल
दूसरी तरफ, ONGC और Oil India जैसी कंपनियां हैं। ये तेल की ऊंची कीमतों का फायदा तो उठा सकती हैं, लेकिन इनकी असली कमाई सरकार की नीतियों, जैसे 'विंडफॉल टैक्स' (Windfall Tax) और फ्यूल प्राइसिंग रेगुलेशन पर टिकी होती है।
भविष्य की चुनौती: ग्रीन एनर्जी
ओपेक ने कहा है कि 2027 तक अपस्ट्रीम एक्सप्लोरेशन पर खर्च $651 बिलियन तक जा सकता है। निवेशकों के लिए असली ट्रैक करने वाली बात यह है कि भारतीय कंपनियां कैसे पुराने तेल बिजनेस के साथ 'ग्रीन हाइड्रोजन' और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स जैसे क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन को मैनेज करती हैं।
