वॉल्यूम बढ़ा, पर प्रॉफिट क्यों घटा?
NMDC का यह तिमाही नतीजा कंपनी के उस संघर्ष को दिखाता है जहां एक तरफ वह आक्रामक तरीके से उत्पादन बढ़ा रही है, वहीं दूसरी तरफ कमोडिटी की कीमतों के उतार-चढ़ाव से जूझ रही है। कंपनी ने इस तिमाही में ₹11,173 करोड़ का अब तक का सबसे ज्यादा रेवेन्यू दर्ज किया, जो पिछले साल की इसी अवधि से 61% ज्यादा है। लेकिन, यह सफलता मुनाफे में कमी की कहानी को छिपा नहीं पा रही है। रिकॉर्ड तोड़ आयरन ओर प्रोडक्शन और सेल्स के बावजूद, EBITDA मार्जिन घटकर 23.3% रह गया, जो पिछले तिमाही के लगभग 28% से कम है। यह साफ दिखाता है कि कंपनी ज्यादा माल तो बेच रही है, लेकिन प्रति टन कमाई बढ़ी हुई लॉजिस्टिक्स, रॉयल्टी और प्रोडक्शन खर्चों को पूरा नहीं कर पा रही है।
कंपनी का नया दांव और कॉम्पिटिशन
मैनेजमेंट का कहना है कि यह फाइनेंशियल ईयर कंपनी के लिए एक बड़ा बदलाव लाएगा। NMDC एक हाई-कैश-फ्लो माइनिंग यूटिलिटी से निकलकर कैपिटल-इंटेंसिव रिसोर्स कंपनी बनने की राह पर है। इसकी झलक ₹6,000 करोड़ के कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) प्लान में दिखती है, जो FY27 के लिए है। इसका मकसद इन-हाउस कोयला निकालकर वर्टिकल इंटीग्रेशन हासिल करना है। इस स्ट्रैटेजी से कंपनी बाहरी फ्यूल प्राइस शॉक से बच सकेगी और EBITDA मार्जिन को 43% तक ले जाने का लक्ष्य है। वहीं, कंपनी NMDC Steel और Rashtriya Ispat Nigam Limited जैसे सब्सिडियरी से फंसे पैसों (receivables) की रिकवरी से भी जूझ रही है। NMDC Steel ने कई सालों बाद पहला प्रॉफिट दर्ज किया है, जो एक उम्मीद की किरण है, पर बाजार अभी भी यह तय नहीं कर पा रहा कि यह स्थायी सुधार है या सिर्फ एक साइक्लिकल तेजी।
निवेशकों के लिए खतरे की घंटी
निवेशकों को इनগুলোর (gains) सस्टेनेबिलिटी पर संदेह रखना चाहिए। सबसे बड़ा खतरा आयरन ओर की कीमतों को लेकर है, जो वॉल्यूम बढ़ने के बावजूद ज्यादा नहीं बढ़ी हैं। अगर ग्लोबल कमोडिटी की कीमतें गिरीं, तो NMDC का बढ़ा हुआ ऑपरेशनल स्केल मार्जिन को और भी सिकोड़ सकता है। इसके अलावा, रेगुलेटरी मुद्दे, जैसे कि मिनरल राइट्स टैक्स में संभावित बदलाव, कंपनी पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाल सकते हैं। डाउनस्ट्रीम स्टील प्रोजेक्ट्स में कंपनी का भारी कैपिटल डिप्लॉयमेंट एग्जीक्यूशन रिस्क भी पैदा करता है; प्योर-प्ले माइनर्स के विपरीत, NMDC अब ज्यादा वोलेटाइल और एसेट-हैवी स्टील मैन्युफैक्चरिंग साइकिल से बंध गई है। आखिर में, सब्सिडियरी स्ट्रक्चर में अटके हुए बड़े रिसीवेबल्स पर लगातार नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि फंड्स की रिकवरी न होने पर फ्री कैश फ्लो और डिविडेंड देने की क्षमता पर सीधा असर पड़ेगा।
आगे का रास्ता
हालांकि ब्रोकरेज फर्म्स का रुख पॉजिटिव है, लेकिन ₹100 के आसपास का कंसेंसस टारगेट प्राइस मौजूदा स्तरों से मामूली बढ़त का संकेत देता है। कंपनी की 67 MTPA प्रोडक्शन कैपेसिटी के लक्ष्य को हासिल करने की क्षमता ही असली परीक्षा होगी। फिलहाल, बाजार के खिलाड़ी टॉप-लाइन वॉल्यूम रिकॉर्ड से ज्यादा ऑपरेशनल कैश फ्लो जेनरेशन और नए कोल इवैकुएशन लाइनों से लागत दक्षता (cost efficiencies) को प्राथमिकता देते नजर आएंगे।
